हे बापू तुम फिर आ जाते(2अक्तूबर विशेष)

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*हे बापू तुम फिर आ जाते*
सुशील शर्मा

हे बापू तुम फिर आ जाते
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते

साबरमती आज उदास है।
तेरा चरखा किस के पास है?
झूठ यहाँ सिरमौर बना है।
सत्य यहाँ आरक्त सना है।
राजनीति की कुटिल कुचालें।
जीवन को दूभर कर डालें।
अंदर पीड़ा बहुत गहन है।
मन को आकर तुम सहलाते।
हे बापू तुम फिर आ जाते।
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते।

सर्वधर्म समभाव मिट रहा।
समरसता का भाव घट रहा।
दलितों का उद्धार कहाँ है।
जीवन का विस्तार कहाँ है।
जो सपने देखे थे तुमने।
उनको पल में तोड़ा सबने।
युवाओं से भरे देश में
बेकारी कुछ कम कर जाते।
हे बापू तुम फिर आ जाते।
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते।

स्वप्न तुम्हारे टूटे ऐसे।
बिखरे मोती लड़ियों जैसे।
सहमा सिसका आज सबेरा।
मानस में है गहन अँधेरा।
भेदभाव की गहरी खाई।
जान का दुश्मन बना है भाई।
तिमिर घोर की गहन निशा में।
अन्धकार में ज्योति जगाते।
हे बापू तुम फिर आ जाते।
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते।

स्वतंत्रता तुमने दिलवाई।
अंग्रेजों से लड़ी लड़ाई।
लेकिन अब अंग्रेजी के बेटे।
संसद की सीटों पर लेटे।
इनसे हमको कौन बचाये।
रस्ता हमको कौन सुझाये।
जीवन के इस कठिन मोड़ पर।
पीड़ा को कुछ कम कर जाते।
हे बापू तुम फिर आ जाते।
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते।

कमरों में है बंद अहिंसा।
धर्म के नाम पर छिड़ी है हिंसा।
त्याग आस्था सड़क पड़े हैं।
ईमानों में पैबंद जड़े हैं।
वोटों पर आरक्षण भारी।
गुंडों को संरक्षण जारी।
देख देश की रोनी सूरत।
दो आंसू तुम भी ढलकाते।
हे बापू तुम फिर आ जाते।
कुछ कह जाते कुछ सुन जाते।

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