जख्म (कविता )

1
48

जख्म (कविता )

वे जख्म थे।
शायद हृदय की तलहटी से ही,
मेरी पलकों तक आ पहुंचे,
लड़खड़ाते हुए जैसे तैसे।
डर था उन्हें अस्तित्व खोने का।
बेदम से देखते रहे मेरी आंखों में।
अब भी ना समझ सका था मैं।
व्यस्त था गिनने में रेजकारी खुशियां।
यकीनन देखा होगा बेउम्मीदी से मुझे,
वरना इस तरह से ना छलकते पन्ने पर।
कि बिखर ही जाएं सिमटने से पहले।
एक उम्मीद थी उन्हें सहारे की।
जबतक मैं उनकी उम्मीद को समझता,
सहारा देकर उठाता,आकार देता कोई,
वे स्वतः ही गढ़े जा चुके थे।
बेशब्द थे लेकिन पन्ने पर पढ़े जा चुके थे।
देख रहा हूं,
हसरत है उनकी आंखों में फिर से।
शायद उठना चाहते हो।
मैंने भी हाथ बढ़ा दिया है,
थाम लेने को उनका हाथ।
अब नहीं उतरने दूंगा कभी उन्हें,
इस तरह पन्नों पर।
और भी मुश्किल है सह पाना उन्हें,
इस तरह पन्नों पर।

–शशांक मिश्रा’सफ़ीर’

Loading...
SHARE
Previous articleतेरे बगैर जिंदगी मेरी उदास है by Dr.Purnima Rai
Next articleएक उम्र गुज़र जाती है by Dr.Purnima Rai
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

1 COMMENT

  1. बुजुर्गों की ओर ध्यान देने को प्रेरित करता सृजन अपनी खूबसूरत छटा बिखेरते हुये हृदयस्पर्शी बन पड़ा है !!बहुत खूब!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here