हिन्दी हिन्दी सब कहें हो हिन्दी सम्मान !! विश्व हिन्दी दिवस की अनंत शुभकामनाएं!!

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विश्व हिन्दी दिवस की अनंत शुभकामनाएं!! हिन्दी हिन्दी सब कहें हो हिन्दी सम्मान

 

1*हिंदी मेरे हिंद का प्राण🇮🇳
राष्ट्र-चिंतन (राजकुमार)

देवों के किसी लोक से उतरी
अदभुत,निर्मल वाणी…
जो अपने शब्दों में कहती
साहित्य की हरेक कहानी
संस्कृत है जिसकी जननी
जिसको दुनिया माथा टेकती
सरस्वती की इसी बेटी को
कहते हैं हिंदी या रेख्ती..
यह कबीर की कड़वी सच्चाई
तुलसी की पावन सीता…
यह रहीम के रहम का सागर
अष्टावक्र की गीता..
इसी रूप में नानक वाणी
सुंदर आरती गाए..
जब निकले मुख सूरदास के
नज़र कन्हैया आए…
जब निकली मुंशी की कलम से
“गोदान” का अर्थ बताया..
महादेवी ने मृत-पुष्प से
कोई यथार्थ सुनाया…
तू ही तो हाला बन निकली
था बच्चन का प्याला…
सुन री मेरी प्यारी हिंदी
हिन्द की तू “मधुशाला”..
परिवार तेरा शब्दों का धनी है
हीरा,मानक ,कोई मणी है…
सुलझी सुभद्रा,बांवरा नीरज
निराले जैसे ..शब्द धनी है…
तू मीरा की तान में बोली..
बनी जो मोहन की हमजोली..
हिंदी तू है हिन्द का जायका
जिसने मुख में मिश्री घोली…
तू हर फिल्म के.. है संवाद में
दिलीप या अमिताभ के अंदाज़ में
हिंदी मेरे देश का दर्पण
जो दिखता है हरेक किताब में..
तेरे ही शब्दों ने मिलकर
सुरों का सुंदर सप्तक बनाया..
सा रे ग म प ध नी स…ने ही
कोई सुर-मन्दिर है सजाया..
तू ही गीत ग़ज़ल में तू है
तू ही भजन में,कव्वाली में
हिंदी ईश्वर का गायन है..
इसको मत बांटो गाली में…
हिंदी इंदिरा की वो बोली
जिसने बंगलादेश बनाया..
किसी अटल ने विश्व में जिसको
पटरानी सा मान दिलाया..
इसी हिंदी के नगमे गाकर
कोई लता महान हो उठी
गूंजा इसी में “वंदे-मातरम”
फिरंगियों का रंग उड़ाया..
हिंदी तू तो गंगा जैसी…
जिस-जिस जिव्हा पर तू आए
कहने वाला धन्य हो जाता
सुनने वाला गुणी हो जाए…
तेरे ही शब्दों को लेकर
आधा भारत जीवन तोले..
तू हरेक माता के मुख से
ममतामयी बनकर रस घोले
मेरी राष्ट्रभाषा का चिंतन
पूरा आज यह विश्व कर रहा..
हिंदी दिवस पे तेरा परिवार “मां”..
झुक-झुक कर तुझे नमन कर रहा..
राजकुमार   सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल,बल कलां,अमृतसर
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2*हिंदी हमारी आत्मा
(कुंडलियां छंद)
सुशील शर्मा

हम सबका दायित्व है ,हिंदी का सम्मान।
हिंदी की उन्नति बने ,भारत की पहचान।
भारत की पहचान ,प्रेरणा देती मन को।
देवनागरी लिपी ,भव्यता दे लेखन को।
कह सुशील कविराय ,खुश रहे हरेक तबका।
हिंदी का उत्थान ,लक्ष्य अंतिम हम सबका।

हिंदी में अभिव्यक्ति ही, हम सबका कर्तव्य।
हिंदी है संजीवनी ,हिंदी भाषा भव्य।
हिंदी भाषा भव्य ,चेतना की अनुभूति।
जीवन में रस भरे ,प्रेम की है ये प्रसूति।
कह सुशील कविराय ,हिन्द की है ये बिंदी।
माथे मुकुट सजाय ,छा गई है अब हिंदी।

मधुमासों सी कुहुकती ,मीठे मीठे बोल।
ओढ़ चुनरिया प्रेम की ,हिंदी है अनमोल।
हिंदी है अनमोल ,नहीं कोई इसकी सानी।
सोने जैसे बोल ,लिपी चूनर सी धानी।
कह सुशील कविराय ,बसी हम सबकी सांसों।
रंग बसंती भरी ,लाजवंती मधुमासों।

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3*विषय -हिंदी का इतिहास
छंद -दोहा(सुशील शर्मा)

बारह वर्गों में बटा ,विश्व भाष अभिलेख।
“शतम “समूह सदस्यता ,हिंदी भाष प्रलेख।

वाणी देवों की बनी , शब्द नाद आधार।
हिंदी की जननी वही ,वैदिक लोक विचार।

ईस पूर्व पंचादशी ,संस्कृत विश्व विवेक।
ता पीछे विकसित हुई ,पाली ,प्राकृत नेक।

अपभ्रंशों से निकल कर ,भाषा विकसित रूप।
अर्ध ,मागधी ,पूरवी ,हिंदी के अवशेष।

एक हज़ारी ईसवी ,हिंदी का प्रारम्भ।
अपभ्रंशों से युक्त था ,आठ सुरों का दम्भ।

वाल्मीकि ,अरु व्यास थे ,संस्कृत के आधान।
माघ ,भास अरु घोष थे ,कालीदास समान।

आदि ,मध्य अरु आधुनिक ,हिंदी का इतिहास।
तीन युगों में बसा है ,भाषा रत्न विकास।

मीरा,तुलसी, जायसी ,सूरदास परिवेश।
ब्रज की गलियों में रचा ,स्वर्ण काव्य संदेश।

सिद्धो से आरम्भ हैं ,काव्य रूप के छंद।
दोहा ,चर्यागीत में ,लिखे गए सानंद।

संधा भाषा में लिखे ,कवि कबिरा ने गीत।
कवि रहीम ने कृष्ण की ,अद्भुत रच दी प्रीत।

पद्माकर ,केशव बने ,रीतिकाल के दूत।
सुंदरता में डूबकर ,गाये गीत अकूत।

भारतेन्दु से सीखिए ,निज भाषा का मान।
निज भाषा उन्नति बने,देती सब सम्मान।

“पंत “‘निराला ‘से शुरू ,’देवी ‘अरु ‘अज्ञेय ‘
‘जयशंकर’ ‘दिनकर ‘बने ,हिंदी ह्रदय प्रमेय।

अंग्रेजों के काल से ,वर्तमान का शोर।
हिंदी विकसित अनवरत ,चिंतन सरस विभोर।

सब भाषाएँ पावनी ,सबका एकल मर्म।
मानव निज उन्नति करे ,मानवता हो धर्म।

हिंदी हिंदुस्तान है ,हिन्द हमारी शान।
जन जन के मन में बसी ,भाषा भव्य महान।

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4*निर्मल पावन गंगा हिंदी (रेखराज स्वामी)
रखे सदा मन चंगा हिंदी
सागर सी गहराई जिसमें
ऊंची कंचनजंघा हिंदी

दिव्य ग्यान ज्यौतिर्मय जिसका , आखर मणिमाला हिंदी
करे निरंतर पान रसिक जन , है नवरस प्याला हिंदी
संयम शौर्य प्रेम प्रतिष्ठा , स्वाभिमान की द्योतक है
सतियों का सत रखने वाली , जौहर की ज्वाला हिंदी

पतित पावनी गंगा जैसी , जीवन सुधारती है हिंदी
संताप निवारण हेतु बने , सतसंग आरती है हिंदी
संतन वाणी व सूरसागर , तुलसी का मानस साक्षी है
जीवन के कुरुक्षेत्र खडे हर , पार्थ की सारथी है हिंदी


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5*मुक्तक (डॉ. यासमीन ख़ान)

जिसने इसको गले लगाया उसको ही सम्मान दिए।
इसकी शान की ख़ातिर जाने कितनों ने ही प्राण दिए।।
हिन्दी से ही इस दुनिया मे हम सब की पहचान है।
हिन्दी ने ही इस भारत को कबिरा और रसखान दिए।।
14-09-2018
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6*मातृ भाषा हिन्दी (प्रमोद सनाढ़्य
राजसमन्द)

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हिन्दी हमारी माँ भी है, ये भाषा ही नही
वात्सल्यता की देवी, परिभाषा ही
नही।
ये धरा वसुन्धरा है, माँ यही है
भारती
आओ मिल के हम उतारे, आज माँ
की आरती।।
प्रीत,प्रेम,प्यार भरे, भाव का भंडार है।
शब्दों की संवेदना, संवाद का आधार है।
संस्कृति की हर कृति ये,साधना का
सार है।।
संतो की जबान है ये, स्वर सुधा की
धार है
माँ की बस आराधना ही, जिन्दगी संवारती।
आओ मिलकर हम उतारें, आज माँ
की आरती।।
वेद है,पुराण है,माँ ज्ञान है, विज्ञान है।
तेरे ग्रंथ, महामंत्र, विश्व का विधान है।।
धर्म तू ही,ध्यान तू ही, गीता है,कुरान है।
हिन्दी मे तू प्रार्थना है, उर्दू में अजान है।।
अंखडता, प्रखंडता, प्रचंडता पुकारती।
आओ मिलकर हम उतारे, आज माँ
की आरती।।
आधुनिकरण का कैसा फ़ैल रहाजाल है।
राष्ट्र का भी लोकतंत्र हाल से बेहाल है।।
दिखावा है,दिखावे पन की जाने कैसी
होड़ है।
प्रतिस्पर्धा, प्रतिस्पर्धा, प्रतिस्पर्धा की
दौड़ है।।
विवेकहीन हो रहा, विवेक से ये आदमी।
एकता को खो रहा, अनेकता से आदमी।।
दर्द से कराहता है, आज देश का ये मन।
पर मौन होकर देखता है संस्कृति का
ये पतन।।
संस्कृति सुधार दे माँ दर्द से उबार दे।
अर्चना करूँ में तेरी ,देश को सँवार दे।।
राष्ट्रीयता की ये निगाहे राह को निहारती।
आओ मिल के हम उतारेँ आज माँ
की आरती।।

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7*(डॉ .शशि जोशी “शशी “)

सरल..मधुर व्यवहार है हिंदी !
अपना तो शृंगार है हिंदी !

भावों के शिखरों से गिरती ,
शीतल जल की धार है हिंदी !

सूर की कान्हा बनकर किलकी ,
मीरा की स्वरधार है हिंदी !

प्रेम से खुसरो ने अपनाया !
स्नेहिल विस्तार है हिंदी !

कला सिखाती है जीवन की ,
विपुल ज्ञान भंडार है हिंदी !

‘शशी “कहीँ शीतल ,कोमल है !
कहीँ प्रबल हुंकार है हिंदी !

जली अखंड ज्योति सी जगमग !
और बनी जयकार है हिंदी !

(डॉ .शशि जोशी “शशी “)
जी .जी .एच .एस .एस .बाँगीधार
सल्ट ,अल्मोडा ,उत्तराखंड

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8*हिंदी गौरव —–(-ओमीश परुथी. संपादक-‘मंगल विमर्श’)
तुलसी ने गा रामचरित किया तुझे पावन
अलख जगाई कबीर ने थाम तेरा दामन
सूर के साँवरे हेतु तू ही थी तुतलाई
मीराँ की प्रेम-पीड़ा तुझ में थी समाई

भारतेंदु ने उन्नति का उत्स तुझ में पाया
भारत-भारती का पद गुप्त जी ने दिलाया
‘राम की शक्तिपूजा’ ने महाप्राण बनाया
‘कामायनी’ ने तुझे शिखर पर बिठलाया

प्रेमचंद ने तेरे लिए खोले गद्य – द्वार
‘चिंतामणि’ का अनूठा मिला तुझे उपहार।
‘अशोक के फूलों’ से हुआ तेरा शृंगार
ले गए अज्ञेय तुझे नए क्षितिजों के पार

पर आज का कलाकार हुआ है दीवाना
मंच पर पहनाया तुझे जोकर का बाना
जिस माँ ने पाला पोसा उसकी की रुसवाई
आराधना से मुख मोड़ कर रहा कमाई
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9*जीवन का आधार, हमारी हिन्दी है।(प्रवीण त्रिपाठी)

*जीवन का आधार, हमारी हिन्दी है।*
*संस्कृति का श्रृंगार, हमारी हिंदी है।1*

*भारत माता भाल, सजीली बिंदी है।*
*जिस पर हमको गर्व, हमारी हिंदी है।2*

*दिल को देती जोड़, हमारी हिंदी है।*
*बंधन देती तोड़, हमारी हिंदी है।3*

*बनी एकता डोर, हमारी हिंदी है।*
*फैल रही हर ओर, हमारी हिंदी है।4*

*जो भविष्य का भोर, हमारी हिंदी है।*
*वर्तमान का जोर, हमारी हिंदी है।5*

*जोड़े घर परिवार, हमारी हिंदी है।*
*नमन करे संसार, हमारी हिंदी है।6*

*भाषाओं का मूल, हमारी हिंदी है।*
*उपवन का इक फूल, हमारी हिंदी है।7*

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10*मुक्तक (अजय कुमार तोमर)

इसे रसखान ने सींचा कबीरा की ये वाणी है।
ये तुलसीदास की बोली ये खुसरो की ब्यानी है।।
बहुत समृद्ध है हिन्दी बहुत उत्कृष्ठ है हिन्दी।
है हिन्दी राष्ट्र की भाषा ये भाषाओं की रानी है।।
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11*  दोहे (डॉ.पूर्णिमा राय)
ज्यों चंदन है भाल पे, त्यों हिन्दी पहचान।
आओ भारतवासियो, हिन्दी को दें मान।।

हिन्दी-हिन्दी सब कहें, हिन्दी से हो प्यार।
मान देश का तब बढ़े, हो  हिन्दी सत्कार।।

उगता सूरज हिंद का ,देता है संदेश।
हिन्दी भारत देश का ,बदल रही परिवेश ।।
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12*मनहरण घनाक्षरी( डॉ.पूर्णिमा राय)

चमके है बिंदी सदा सुन्दर भाल नारी के
बनी देश भारत की पहचान हिंदी से।।

बोले सदा वाणी यहीजय-जयकार हिंदी
भाषा उपभाषा को भी मिला मान हिंदी से।।

हिंदी भाषा सीधी-सादी मीठी बोली बड़ी प्यारी
धरोहर संस्कृति का मिला ज्ञान हिंदी से।।

देह में बसी हो हिंदी दिल में हो धड़कन ,
मिटे भाषा जाति धर्म व्यवधान हिंदी से।।

निम्न लिंक अवश्य सुनें

https://youtu.be/HUnfhzGR9xU

Presented by Dr.Purnima Rai

 

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अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

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