जिंदगी अचानक यूँ थम सी गई!! 

0
46

जिंदगी अचानक यूँ थम सी गई!!

(तवायफ) पर आधारित सृजन
————————– – ———–
जिंदगी अचानक यूँ थम सी गई।
सोच कर कुछ वो सहम सी गई।
क्या हकीकत से अपने वो अनजान थी?
जो न सहना था हंस के वो सब सह गई।

हाँ ,मैंने सुनी उसके मन की व्यथा,
धड़कनें उसकी कुछ कह सी गई।
उसके माथे की सिलवट ने भी कुछ कहा।
कुछ तो लहजे की उसके,अदब कह गयी

जिंदगी अचानक यूँ थम सी गई।
सोच कर कुछ वो सहम सी गई।

उसकी मुस्कान में था,एक बचपन छिपा।
उसकी आँखों में यौवन की कुछ बात थी।
कुछ नए लोग थे,कुछ नई बोलियां(नीलामी)।
जिस्म था फिर वही औ’ वही रात थी।

फिर से होंठो पर भड़कती लाली वही।
चाल ऐठन भरी,फिर से मतवाली वही।
यूँ सलीके से माथे पर कुमकुम लगा,
जख्म गहरे वही,फिर सवाली वही।

चीथड़े हुस्न को टांकती हर दफा।
आस भी है सभी से,सभी से वफ़ा।
हमने देखा नहीं यूँ तड़पते हुए।
विवशता में उसको यूँ बिकते हुए।
हमने रौंदा यहाँ बाग़ के फूल को,
जख्म नोचे हैं हमने तो रिसते हुए।

लिखी नज्म तम में थी लुटती शमां
कहानी मेरी फिर सिमटती गयी।
छीना जहर को जमाने से जिसने,
जहर को वो हौले से पीती गयी।
जिंदगी अचानक यूँ थम सी गई
सोच कर कुछ वो सहम सी गई।

—शशांक मिश्रा”सफ़ीर”

 

Loading...
SHARE
Previous articleराख हुये जग रो दिया !by Dr.Purnima Rai
Next article हिन्दी हिन्दी सब कहें हो हिन्दी सम्मान !! विश्व हिन्दी दिवस की अनंत शुभकामनाएं!!
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here