ऊब !

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ऊब
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स्त्री का
चूल्हे चौके से
हट कर-
निष्क्रिय
बिस्तर पर पडे रहना-
परित्यक्त नाव सा जैसे
घाट पर
निश्चल खडे रहना–
चूल्हे की मद्धिम आग
देख कर
(गहरी ऊब से व्यथित)
वह सोचती है-
क्या करूं
किधर जाऊं
किस के लिए खाना पकाऊं
किस के लिए चाय
दिन भर,
और देर सबेर
दूध करू गरम —
प्रभु मेरे !
क्षमा करना-
मेरा परिवार मुझे लौटा दो
मेरे बच्चों को फिर से
छोटा बना दो-

वे दूर कहीं चले गए
और हम
घाट पर
नाव से निश्चल बंधे रहे।
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कैलाश आहलूवालिया

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