श्री कृष्ण जन्माष्टमी :अचिन्त साहित्य के संग !!

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1*समर्पण (सुशील शर्मा)

हे कृष्ण
जिस प्रकार एक बछड़ा
अपनी माँ के पीछे घूमता है
मैं आपके पीछे लगा हूँ।
माँ कितना ही दुत्कारे
गाय कितना ही उससे दूर हो
उसकी निगाह अपने बछड़े पर
निरंतर रहती है।
वैसे ही मुझे पता है आप मुझसे
कितने ही रुष्ट रहें आपका ध्यान
हमेशा मेरी ओर लगा रहता है।

हे कृष्ण
आप मेरी माता है
मेरे परमपिता भी आप है
आपके अंश से ही मैं जन्मा हूँ।
अंत में आप में ही समा जाऊंगा।

हे कृष्ण
मेरे मन में आपसे अलग कोई
भाव न हो न ही कोई तत्व हो।
आपके सिवा मेरा कोई चिंतन न हो।

हे कृष्ण
मेरा हर शब्द आप हो।
हर ध्वनि आप हो।
हर रिश्ता आप से जुड़ा है।
मेरा आधार आप पर खड़ा है।
मेरा तन मन धन
मेरे मान मेरे अपमान
मेरी क्षुधा मेरी तृप्ति
मेरे वचन मेरा लेखन
मेरा जीवन मेरा मरण
अर्पित है आपको।
श्री कृष्ण चरणम मम।
श्री कृष्ण शरणं मम।

2* डॉ – अरुण कुमार श्रीवास्तव अर्णव

कृष्ण फिर आओ मेरे देश ।
सजे फिर सुन्दर ये परिवेश ।।

बताओ फिर से गीता ज्ञान ।
जगत का करो आज कल्याण ।।
मधुर सी मुरली की वो तान ।
जगत में नूतन सा इक गान ।।
सभी के तुमने हरे कलेष ।
कृष्ण फिर आओ मेरे देश ।।

जगत में आज ख़ुशी की गूंज ।
भावना की फैली अनुगूँज ।।
मनाये सुन्दर सा त्यौहार ।
करें फिर आज सभी से प्यार ।।
धन्य है गोकुल का वह गाँव ।
रचे नित नूतन नव परिवेश ।
कृष्ण फिर आओ मेरे देश ।।

यमुना का एक मधुरिम घाट ।
ह्रदय के खोले सभी कपाट ।।
चलो फिर आज रचायें रास ।
लिए अपने मन में उल्लास ।।
फिर कदम्ब के नीचे गूंजे ,
गीता के सारे उपदेश ।
कृष्ण फिर आओ मेरे देश ।।

 

3*डॉ नित्यानंद’नीरव

चल मिले कान्हा संवरिया
नन्द बाबा दुवरिया
मैया यशोदा जी पलना झुलावें
गा गा के लोरी ललन के सुलावें
छाई भादों कारी बदरिया
नन्द बाबा दुवरिया।
ढोल करतार संगबाजे बधाई
लुटे खजाना औरि बांटे मिठाई
नाचेले सगरो नगरिया
नन्द बाबा दुवरिया।
श्याम सलोनी और सांवरी सूरत
मंद मुस्कान सोहे मोहिनी मूरत
मोहि गईली ब्रज की गुजरिया नन्द बाबा दुवरिया।

 

4*एस के जूही, विशाखापट्नम

जन्म लिए गिरिधारी

नंद बाबा के आंगन,
नाचे गोकुल के नर-नारी।
हीरा मोती लुटाबे यशोदा,
हैं जन्म लिए गिरिधारी।
……………
कलियां खिली चमन में,
जब जन्में नंदलाला।
हरियाली बागों में हुई,
चारों तरफ उजाला।

रोहिणी नक्षत्र में जन्में,
कहलाए कुंजबिहारी।
हीरा मोती लुटाबे यशोदा,
हैं जन्म लिए गिरिधारी।
……………
दुनिया के पालनहारी,
अपना शिशु रूप बनाए।
इस रूप को देखने के लिए,
देवी-देवता अकुलाए।

शंकर तो कैलाश को छोड़कर,
आए देखने बनके भिखारी।
हीरा मोती लुटाबे यशोदा,
हैं जन्म लिए गिरिधारी।
………..

प्रेम प्रणेता,प्रेम मूर्ति प्रेम साधक, परमानंद सुखदायक प्रेमी परम पुरुष श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की असंख्य बधाई।

5*डॉ. यासमीन ख़ान

कान्हा का जन्मोत्सव , मना रहा हर द्वार।
भक्त जनों को बाँट रे , अपना नेह दुलार।

वासुदेव तुमको कहूँ, अथवा नन्द किशोर।
मन मोहन माधव कहूँ या फिर माखनचोर।।

7*राजकुमार राज (धर्म-दर्पण)

कृष्ण का जन्म एक लीला नही बल्कि एक गहरा संदेश है..यह जन्म बताता है कि..किसी भी योनि में लिया जन्म एक कारावास है..दरवाजों पे खड़े सिपाही विकार के प्रतीक हैं..वासुदेव पिता नही परमपिता परमात्मा के प्रतीक हैं..कारावास के दरवाजे खुलना अपार कृपा के दर्शन हैं..जमुना की उफनती लहरे ,बारिश,आंधी और तूफान जीवन की विपदाओं के सूचक हैं..और नन्द गांव और ब्रज भूमि वैकुंठ का प्रतीक है..
हे आत्मन ! हम जीवन में कारावास की तरह आते हैं और विकार हमारे साथ-साथ विकसित होते हैं..परन्तु अगर परमपिता परमात्मा हमारे सिर पे हाथ रख दे तो इस कारावास के द्वार खुल जाते हैं..और एक विशुद्ध आत्मा के रूप में जब ईश्वर हमें अपने शिशु की तरह हाथों में उठाता है..तो सांसारिक विपदाएं समाप्त हो जाती है और जल,थल और वायु ऐसी विशुद्ध आत्माओं का वंदन करने को बेचैन रहते है..ऐसे में भव सागर से पार हम उस वैकुंठ लोक में पहुंच जाते है..यहां रास है,नृत्य है,संगीत है और केवल और केवल…कृष्ण,कृष्ण और कृष्ण है…

रे मन तुझको मार कर
राधा मैं हो जाऊं…
दूर लोक मेरा सांवरा
और मैं उसकी हो जाऊं..

8*अजय कुमार तोमर

दुखी भक्तों की सुध भगवन यहाँ हर बार लेते हैं।
हमेशा अपने भक्तों को भंवर से तार लेते हैं।।
धरा पर पापियों के पाप का जब जोर होता है।
पाप का नाश करने को कृष्ण अवतार लेते हैं।।

9* प्रमोद सनाढ़्य (राजसमन्द)

*झाँझ पखावज नोबत बाजत*
*बाँट बधावन नाचत गोरी।*

*मात जसोमति लाड़ लड़ावत*
*नेहिं निहारत गावत लोरी।।*

*खेलत भागत शोर मचावत*
*पैंजनिया पग बांधत डोरी।*

*झाँकत देखत कौनहि पावत*
*मोहन खावत माखन चोरी।*

 

10*ओमीश परुथी

तुम्हारे स्पर्श को लालायित
कालिंदी की पावन धार।

सुत को पग धरते देख
यशोदा का उमड़ा दुलार।

तुम्हारे आलिंगन से गदगद
सुदामा के कृतज्ञ उद्गार।

अर्जुन को अचंभित करता
तुम्हारे रूप का महाविस्तार।

गीता के शाश्वत श्लोकों का
अद्भुत,अलौकिक उच्चार।

हर कहीं आपकी छवि-छाप
बूँद से ब्रह्मांड तक,हे कान्हा!
हैं उजागर, आप ही आप!!

 

11*प्रवीण त्रिपाठी, उदयपुर

*नटवर नागर नंद दुलारे, हृदय हमारे बसते हो।*
*अद्भुत अनुपम लीलाओं से, भक्तों का मन हरते हो।*

बाल रूप में लीला करके, लीलाधारी कहलाये।
नष्ट किया सारे असुरों को, गोकुल में जो भी आये।
अत्याचारी कंस हनन कर, हरि बन हर दुख हरते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..१*

वयःसंधि में बाल सखों सँग, सबके मन आह्लाद भरा।
बलदाऊ अरु मित्र सुदामा, के सँग वन से लाते धेनु चरा।
कालिय रूप प्रदूषण से प्रभु, यमुना निर्मल करते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..२*

ब्रज मंडल में बसी गोपियाँ, तुम पर जातीं वो वारी।
चाहें छेड़ें कृष्ण कन्हैया, फिर भी लेतीं बलिहारी।
वृंदावन में रास रचाकर, राधा मोहित करते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..३*

योग और माया का अंतर, तुमने जग को सिखलाया।
भक्त मित्र को कैसे जीतें, दुनिया को यह दिखलाया।
राधाकृष्ण बने मनमोहन, प्राणवायु सी भरते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..४*

कूटनीति अरु राजनीति में, जग में तुम बेजोड़ बड़े।
तुमको सँग ले जाने खातिर, दोनों थे कर जोड़ खड़े।
सेना दुर्योधन को देकर, खुद अर्जुन सँग चलते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..5*

कर्तव्यों से मुख मत मोड़ें, जीवन के यह मर्म दिया।
इच्छित फल उसको मिलता है, जिसने निश्छल कर्म किया।
विजय धर्म की हो अधर्म पर, यही सोच तुम रखते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..6*

सदा सत्य पथ पर चलना है, बीच रणांगन बतलाया।
मोह अधर्मी से मत करना, अर्जुन को था सिखलाया।
गीता के उपदेशों में प्रभु, शब्द-शब्द तुम झरते हो।
*नटवर नागर नंद दुलारे…..7*

*श्रीहरि के अवतार कन्हैया, जग आनंदित करते हो।*
*नटवर नागर नंद दुलारे, हृदय हमारे बसते हो।*

12* जन्माष्टमी विशेष_______ (मनहरण घनाक्षरी )by Dr.Purnima Rai

1 * यमुना के तट पर (मनहरण घनाक्षरी )

खिली-खिली बगिया है यमुना के तट पर;

बोले राधा कान्हा प्यारे दरस दिखाओ रे।।१

गोधूलि बेला पावन शांत चित्त पनघट;

यमुना के कूल पर बाँसुरी बजाओ रे।।२

प्रेम से सजी है धरा चाँद संग चकोर है;

पावन पुनीत मन प्रेम से सजाओ रे।।३

मुझमें समाया है तू तुझमें समाई हूँ मैं;

राधा कान्हा कान्हा राधा जग को बताओ रे।।४
2 * नटखट मोहन (मनहरण घनाक्षरी)

नटखट नंद लला घुटनों के बल चले;

मुख पे लगा माखन मैया से बचाओ रे।।१

गली-गली शोर हुआ मोहन चित्तचोर बना;

गोपियों का चैन उड़ा कान्हा को बुलाओ रे।।२

प्रेम में दीवानी मीरां जग से बेगानी दिखे;

मीरां ,राधा जैसा प्रेम खुद में जगाओ रे ।।३

पापियों का नाश कर ,जग का उद्धार किया;

पावन जन्माष्टमी को, “पूर्णिमा”मनाओ रे।।४

https://www.youtube.com/playlist?list=PLoSEQqzWO_SrQZSUQLDuagGay_USTxtVa

इस लिंक पर आप सभी श्री कृष्ण जी पर डॉ पूर्णिमा राय की लिखी रचनाएँ उनकी आवाज में सुन सकते हैं।

सभी रचनाकारों का हार्दिक आभार!

 

संकलित  डॉ.पूर्णिमा राय,drpurnima01.dpr@gmai.com 

 

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अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

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