बचपन के स्कूलों की जगह अब *दुकाने एवँ मॉल बन रहें है!

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बचपन के स्कूलों की जगह अब
*दुकाने एवँ मॉल बन रही हैं*
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जिस स्कूल की छत के नीचे
बैठ के खींची पहली रेखा
आज उसी स्कूल की छत पर
बुलडोजर को चलते देखा
जहाँ शारदे के मन्दिर मे
दीप ज्ञान का जलते देखा
आज उसी पावन मन्दिर को
फिर मिट्टी मे मिलते देखा
रोज बनाता फिरता हूँ मै
ऊँचे ऊँचे भवन अनोखे
बड़े बड़े शहरों मे जाकर
बड़ी इमारत बड़े झरोखे
मगर आज कमजोर हो गईं
खुद की मंजिल की बुनियाद
देख टूटता स्कूल मेरा
बिलख उठी बचपन की याद
याद आ गये सारे गूरूजन
जिनका गुजरा यहाँ पर जीवन
जिनकी शिक्षा के फूलों से
महका करता था ये मधुबन
सीता, गीता और जसोदा
मधु बहन जी जैसी बातें
यमुना शंकर,सरवर खाँ जी
मदन पुरी जी की वो लातें
बापना साब के मीठे बोल
इन्दर जी की गेंद और गोल
मन्नू भाई का संगीत
उमा शंकर जी के गीत
पाराशर मे प्यार छिपा था
ममता और दुलार छिपा था
मात पिता के मन के जैसा
गुरूओं का सम्मान छिपा था
आज वही सम्मान भी रोता
मन का स्वाभिमान भी रोता
देख टूटते स्कूल की छत
बचपन का वो ज्ञान भी रोता।।
क्या ऐसी लाचारी आई
जो स्कूल भी बेच दी भाई
क्यों दौलत की अंधी दौड़ मे
मन्दिर की भी बोली लगाई
अगर कमी होती तो कहते
पहली रोटी तुमको देते
कर्ज है मिट्टी का हम पर भी
फर्ज निभाकर पूरा करते
रोती ये स्कूल की गरीमा
रोते उसके रत्न ये सारे
विफल हो गये शंभू दादा
ईश्वर विनोद के प्रयत्न सारे
दर्द झलकता सबके भीतर
झाँक के जिस जिस मन मे देखा
स्कूल के उस ब्लेक बोर्ड को
जब कबाड़ मे बिकते देखा
समय की उस टनटन घंटी को
भँगार भाव मे तोलते देखा
पानी पीने की टंकी को
जब पानी मे घुलते देखा
आँखो मे आँसू भर भर कर
भवन को मैने गिरते देखा
जिस स्कूल की छत के नीच
बैठ के खींची पहली रेखा
आज उसी स्कूल की छत पर
बुलडोजर को चलते देखा।।

प्रमोद सनाढ़्य
राजसमन्द

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