झुकेगा सर नहीं अपना, किसी तलवार के आगे!

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झुकेगा सर नहीं अपना, किसी तलवार के आगे।*

*झुकेगा सर नहीं अपना, किसी तलवार के आगे।*
*अटल होकर खड़े होंगे, बुरे व्यवहार के आगे।*

बढ़ायेंगे कदम अपने, न जब तक लक्ष्य हो हासिल।
बढ़ेंगे नित्य हम अविचल, भले ही दूर हो मंज़िल।
डरेंगे हम नहीं अब तो, किसी प्रतिकार के आगे।1
*झुकेगा सर नहीं……*

लगा कर शक्ति हम पूरी, बढ़ाएं नाव को अपनी।
न हो नौका कभी डगमग,भले लहरें उठें कितनी।
किनारा भी मिलेगा कल, हमें मँझधार के आगे।2
*झुकेगा सर नहीं……*

भरोसा बाजुओं में है, सधेंगे लक्ष्य सब अपने।
वतन पर जान देंगे हम, सदा देखे यही सपने।
नहीं कुछ और दिखता है, वतन के प्यार के आगे।3
*झुकेगा सर नहीं……*

करे रिपु यत्न कितने भी, सफल फिर भी न हो पाये।
चले कितनी नई चालें, सदा मुँह की ही’ वो खाये।
दबा कर दुम सदा भागे, हमारे वार के आगे।4
*झुकेगा सर नहीं……*

*दिखाएंगे नया जौहर, हर इक हथियार के आगे।*
*झुकेगा सर नहीं अपना, किसी तलवार के आगे।*

*प्रवीण त्रिपाठी, उदयपुर,

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