आज़ादी (लघुकथा)

3
143

आजादी(लघुकथा)

माँ आंगन में बैठी चावल चुन रही थी तब तक पीछे से आठ साल का एक अबोध बालक राजू गले से लिपट कर माँ के पीठ पर झुलने लगा।
“माँ कल सुबह स्कूल में झंडा फहरेगा, मुझे कल एकदम सुबह जगा देना, सर जी बोले है कि नया कपड़ा पहन कर स्कूल आना है।” राजू बोला।
“अच्छा ठिक है, जो कपड़ा तू मेला पहन कर गया था उसे ही पहन लेना, एक दो बार ही तो पहना है” माँ बोली।
“नही वह वाला पुराने हो चुके हैं, दुसरा खरीद दे ना, स्कूल ड्रेस जैसा।”
“कहाँ से खरीद दूँ एक दिन में, हर साल स्कूल में सरकार के तरफ से नया स्कूल ड्रेस सिने के लिए कुछ पैसा दिया जाता था, इस बार तो एक फूटी कौड़ी भी नही मिला और घर की हालत नही देख रहा है, तेरा पापा को तीन माह से तनख्वाह नही मिला, उस में भी राखी का त्यौहार आने वाला है, राखी में तो तेरी बुआ तुझे कपड़ा लेकर तो आएंगी ही।” माँ बोली
“अच्छा माँ तो पाँच रुपया तो दे दे, छोटा वाला वह झंडा खरीदना है।” राजू बोला।
“ठीक है जा पर्श में दस रुपये हैं निकाल ले, और एक झंडा खरीद लेना और पाँच रुपये की आधा किलो आलू खरीद कर ले आना।”
अबोध बालक राजू तो दस रुपया लेकर दुकान चला गया और माँ चावल चुनते हुए यही सोच रही थी कि देश को आजाद हुए कितने साल हो बीत गये पर इस गरीबी से आजादी कब मिलेगी।



जियाउल हक

Loading...
SHARE
Previous articleवन्दे मातरम्
Next articleआज़ादी पंख by Dr.Purnima Rai
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

3 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here