स्वतंत्रता दिवस पर विशेष :पुष्प की पीड़ा

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स्वतंत्रता दिवस पर विशेष :पुष्प की पीड़ा

पुष्प की अभिलाषा शीर्षक से लिखी कविता से आप भी चिरपरिचित हैं न ? आपने भी मेरी तरह यह कविता पढ़ी या सुनी जरूर होगी । कई बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में किसी बच्चे को पुरस्कार लेते देख तालियां भी बजाई होंगी । मन में आया कि एक बार दादा चतुर्वेदी के जमाने और आज के जमाने के फूल में शायद कोई भारी तब्दीली आ गयी हो । स्वतंत्रता के बाद के फूल की इच्छा उसी से कयों न जानी जाए ? उसी के मुख से ।
फूल बाजार गया खासतौर पर ।
-कहो भाई , क्या हाल है ?
– देख नहीं रहे , माला बनाने के लिए मुझे सुई की चुभन सहनी पड रही है ।
– अगर ज्यादा दुख न हो रहा हो तो बताओगे कि तुम्हारे चाहने वाले कब कब बाजार में आते हैं ?
– धार्मिक आयोजनों व ब्याह शादियों में ।
– पर तुम्हारे विचार में तो देवाशीष पर चढ़ना या प्रेमी माला में गुंथना कोई खुशी की बात नहीं ।
-बिल्कुल सही कहते हो । मेरी इच्छा तो आज भी नहीं पर मुझे वह पथ भी तो दिखाई नहीं देता , जिस पर बिछ कर मैं सौभाग्यशाली महसूस कर सकूं ।
– कयों ? आज भी तो नगर में एक बडे नेता आ रहे हैं ।
– फिर क्या कल
करूं ?
– कयों ? नेता जी का स्वागत् नहीं करोगे ?
– आपके इस सवाल की चुभन भी मुझे सुई से ज्यादा चुभ रही है । माला में बिंध कर वहीं जाना है । मैं जाना नहीं चाहता पर मेरी सुनता कौन है ?


कमलेश भारतीय

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