मानसिकता (लघुकथा)

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मानसिकता (लघुकथा)

बंदरों का एक झुंड जंगल से निकलकर उछल कूद मचाता सड़क के करीब आ गया।इतने में ही दूर से तेज रफ्तार से आती कार देखकर सभी कूदकर सड़क पार कर गए लेकिन एक बंदर पीछे रह गया।दुर्भाग्यवश वह कार
की चपेट में आ गया।कार तो निकल गयी पर बंदर अचेत हो गया था।सभी साथी बंदर उसके पास पहुंचे।चारों ओर से उसे घेरकर बैठ गए।उसके ठीक होने का इंतज़ार करने लगे।तभी एक बंदर ने समीप के पेड़ से पत्तों से भरी टहनी तोड़ी और उसे पंखे की तरह हवा करने लगा।
कुछ ही देर में वह बंदर होश में आ गया।सभी खुशी से नाचते कूदते जंगल की ओर चल पड़े।रास्ते में एक बंदर ने कहा–“इंसान हमें अपना पूर्वज मानता है।अब बताओ आज जो घटना हमारे साथ घटी वही किसी इंसान के साथ घटी होती तो क्या होता?”
एक बंदर जो सबसे बुजुर्ग तथा समझदार था बोला –“घायल इंसान के आसपास खड़े लोग अपने मोबाइल निकालकर विडियो बनाते,सेल्फी लेते और आगे बढ़ जाते।

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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