जीवन- पथ!!

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, “जीवन- पथ”
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जटिल नही है
ये
“जीवन पथ,”
पर,
उलझी सुलझी
राहें हैं।
कोई देखता किसी
नजर से,
किसी की ओर
निगाहें हैं।।
मानो तो है नरम
दूब ये
वर्ना पत्थर के
टीले
किसी राह रेशे रेशम
के,
कहीँ हैं
चुभते शूल
नुकीले ।।
है सोच सोच मे फर्क
यहाँ,
फिर भी सुंदर है
देखो
जहाँ।।
कहीँ भरे भरे से
लगते
कहीं आधे से खाली
प्याले,
कहीं प्लेट मे जूठन
छूटी
कहीं पेट से दूर
निवाले।।
इन्हीं सोच के बीच
डोलता
इस “पथ” पर ये पूरा
जीवन।।
कभी असमंजस कभी
हाँ ना
कहते,
हो जाता है
पूरा
जीवन।।
हो जाता है क्रम
ये
पूरा
बस दो ही सांसो
के बीच,
धूरी है इसकी
दो ही सांसें
जो देती हैं जीवन
सींच।।
जब आतीहै साँस
ये पहली,
जग ये हँसता
ताली देकर,
और
छूटती साँस
आखिरी
जग ये रोता
काँधे लेकर।।
बाकी
सारींं साँसों तो
इस
समय चक्र मे
खो जाती,
और बना कर
एक कहानी
“जीवन गाथा”
लिख जाती।।
तो,
“कर्म” जहाँ
मे
कर लें
ऐसे
जिनसे हो ये
दूर
अंधेरा,
“ग्रन्थ” पढ़े
कोई
“जीवन पथ”
का
“किरदार”
सामने हो
बस तेरा ।।


प्रमोद सनाढ़्य
राजसमन्द

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