काश! हरे पेड़ ना काटे होते।

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“कविता का कोना”
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-पर्यावरण
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मैले कुचले कपडे,
मिट्टी मे सने हाथ
बदन से उठती पसीने की गंध।
गरम हवा के थपेडों को
सहन करता
थका हारा बैठा है एक
“किसान”
अपने बैलों के साथ
सूखे बरगद के
पेड़ के नीचे
भरी दोपहर मे
तपन धूप की
सहता हुआ
कभी,
देखता है नम
आंखों से
प्यासे खेतों को
और खेतों मे
बिना पानी के
पनप रहे
बेवजह के उलझाड़
को,
बिखरी पड़ी
प्लास्टिक की
थैलियों के टुकड़ों
को
और प्यास से तरसते
भटकते जानवरों
को
जो कभी वन मे भी
दुर्लभ नजर आते थे।
आज सड़को पर
विचरने को
मजबूर हैं।
फिर
गर्दन उठा कर ताकता है
आसमान को इस आस के
साथकि कब बरसायेगा
“मेह”
बुझाने जमीं की प्यास।
पर
हो निराश
चल पडता है घर की ओर।
और ,
लौट कर आता है
अपने किशोर
पुत्र के साथ,
लेकर चेहरे पर
नई उमंग व ताजगी भरे
उर्जा के भाव।।
फिर
खोदकर खेत की पालियों
पर खड्डे
वो रोप देता है
“नये पोधों की खेप”
और बता देता है
बेटे को
बिना कुछ कहे
चुपचाप
खुद की
गलतियों का अहसास
कि काश!
“हरे पेड़ ना काटे होते”

“प्रमोद सनाढ़्य ”
राजसमन्द

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