अजनबी सी थी यह जीवन डगर !by Dr.Purnima Rai

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अजनबी सी थी यह जीवन डगर !

गज़ल by Dr.Purnima Rai

अजनबी सी थी यह जीवन डगर।
मिल गया आप जैसा इक हमसफर।।
लफ्ज़ खामोश हैं लब थिरकने लगे ,
कुछ न कह पाये मिलने लगी ये नज़र ।।
वक्त कटने लगा फिर पता न चला ,
कब बसा प्यार का ये सुन्दर नगर।।
अब तन्हाई का गम नहीं है हमें ,
रूह के मेल से खिलता मन शज़र।।
थाम कर हाथ चलना यूँ ही सदा,
‘पूर्णिमा ‘पे हुआ आपका ही असर।।

डॉ .पूर्णिमा राय ,पंजाब

 

 

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