तू जो मुझसे जुदा हो गया!!

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ग़ज़ल

तू जो मुझसे जुदा हो गया।
आईना भी ख़फ़ा हो गया।।

ढूंढती हूँ उसे दर- ब- दर।
वो जो लम्हा हवा हो गया।।

बस नज़र से नज़र क्या मिली।
प्यार का सिलसिला हो गया।।

याद फिर से तिरी आ गई।
ज़ख़्म दिल का हरा हो गया।।

तीरगी से लड़ी तो लगा।
रोशनी का पता हो गया।।

भूख वो ही वही मुफलिसी।
साल कैसे नया हो गया।।

लुट रही आबरू – ए – वतन।
खेल जैसे ज़िना हो गया।।

बन के नेता मिरे देश में।
आदमी बेहया हो गया।।

फिर न जीने की हाजत रही।
यार जब बे -वफ़ा हो गया।।

मन्ज़िलों के लिए आज तो।
जिस्म भी रास्ता हो गया।।

आज तो धर्म के नाम पर।
आदमी अश्किया हो गया।।

फ़िक़्र है हम सभी की यही।
क्या तवक़्क़ो थी क्या हो गया।।

“यास्मीं ” अब तिरा ये बदन।
ख़्वाब का मख़बरा हो गया।।


डॉ. यासमीन ख़ान

अश्किया ,ज़ालिम बेरहम,
ज़िना-अवैध सम्बंध, तीरगी-अंधेरा, हाजत-ज़रूरत

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