हर शख़्स शै मेंं शुमार हो गया!!

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हर शख़्स शै मेंं शुमार हो गया।
मुलक सारा बाजार हो गया।।

कहारों से डोली उठती ही नहीं।
दुल्हन से भारी शृंगार हो गया।।

दौलत के जलवे हुए इतने सुर्ख।
औजार देख हथियार हो गया।।

कला बेचने की कला न आई।
मसखरों मेंं कवि ख़्वार हो गया।

भाव भए भाप,नेह ठंडा पड़ा ।
जीवन महज कारोबार हो गया।।

खेत शमशान-से सुलगने लगे।
होरी फिर से लाचार हो गया।।

बोली खिलाड़ियों की लगने लगी।
खेल बाज़ार का शिकार हो गया।।

——————–ओमीश परुथी———

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3 COMMENTS

  1. पूर्णिमा जी,आपकी ग़ज़ल अच्छी लगी।एक उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई।

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