उऋण नहीं( लघुकथा)

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उऋण नहीं ( कमलेश भारतीय)

मुझे नहीं पता था कि अचानक इतनी तेज बारिश आने वाली है । नहीं तो मैं कल के लिए काम टाल देता । काम भी क्या था ? मोबाइल थोडा बिगड गया था । कस्टमर केयर के नये ऑफिस को ढूंढता मैं घर से दूर निकल आया था । ऑटो से पांव नीचे रखने की देर थी कि जैसे बारिश मेरी इंतजार में ही थी । खूब तेज । अंग्रेजी में कैट्स एंड डाॅग । मैं भागा कि कहीं थोडी सी भी शरण मिल जाए ।
सामने झुग्गियां थीं । तिरपाल बारिश को मुंह चिढा रहे थे । जो झुग्गी सबसे पहले आई उसी में घुस गया । पहले से ही मेरे जैसे अचानक बारिश की मार में फंस गए दो लोग और बैठे थे । वृद्धा ने मुझे कुर्सी दी और खुद नीचे बैठकर बारिश का पानी बाहर फेंकने में जुट गयी । देर तक वह इसी मशक्कत में लगी रही कि अनचाहे अतिथियों को पानी छू भी न पाए ।
बारिश देर तक चलने वाली थी । मैंने अपने एक मित्र को फोन लगाया । उसने पूछा कहां हो ? मैंने कहा कि यह गरीबों की बस्ती है , झोपड़ियों के कहीं नम्बर होते हैं ? मैं बाहर निकल कर खडा हो जाऊंगा । मित्र आ गया और मैं भीगता हुआ बाहर जा खडा हुआ । मन में एक बात आई कि इस वृद्धा का यह ऋण और सम्मान जरूर लौटाऊंगा ।
दूसरे दिन अखबार के सिटी संस्करण ने बताया कि प्रशासन ने इन झोपड़ियों को उखाड़कर फेंक दिया । जहां मुझे दुख के समय शरण मिली , वह झोंपड़ी अब नहीं हैं । यह विश्वास करने में मुझे बहुत समय लगा । अभी तक मैं इससे उबर नहीं पाया हूं । कैसे और कहां ऋण चुकाऊं।

-कमलेश भारतीय 9416047075

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