कुछ ऐसे लोग भी होते हैं (संगीतकार मदनमोहन के जन्मदिन पर विशेष)

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कुछ ऐसे लोग भी होते हैं
(संगीतकार मदनमोहन के जन्मदिन पर विशेष)

वो शख्स बामुश्किल 50 साल जी पाया..आज ही के दिन 25 जून 1925 को बगदाद की धरती पर एक समृद्ध अधिकारी चुन्नीलाल राय साहब के यहां एक बच्चा पैदा हुआ…बाद में राय साहब मुम्बई आ गए और फिल्मिस्तान स्टूडियो की मालकियत में भागीदार बने और फ़िल्म निर्देशन का कार्य शुरू किया….पिता अपने पुत्र को सिनेमा से दूर सेना में फौजी अधिकारी की वर्दी में देखना चाहता था..बेटा 2 साल फौज में रहा और फिर आल इंडिया रेडियो से जुड़ गया…रगों में संगीत था..तो यही से रास्ते बदले और मायानगरी के आंचल में समा गया…..

दोस्तो ! आज भी भारत की युवा लड़की एक गीत भावुकतावश अक्सर गुनगुना उठती है….
कि.. लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो…

आज भी एक गीत पांवो में थिरकन भर देता है….
कि… झुमका गिरा रे,बरेली के बाजार में

आज भी रफी के वो मीठे बोल अंदर तक समा जाते है कि…
तुम जो मिल गए हो,तो ये लगता है
ये जहां मिल गया

दोस्तो ! सच पूछिए तो इस इंसान ने लता मंगेशकर को विशेष पहचान दी…उसने उससे नायाब ग़ज़लें गवाई….जैसे कि

‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’, ‘

आज सोचा तो आँसू भर आए’, ‘

आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे’

है इसी में प्यार की आबरु,वो जफ़ा करे मै वफ़ा करूँ

हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ, आराम कहाँ’।
लता इसे राखी बांधती थी और बड़ा भाई मानती थी..एक इंटरव्यू में लता जी ने कहा कि…‘दूसरे संगीतकारों ने मुझे गाने (साँग्स) दिए हैं, जबकि मदन भैया ने गाना (संगीत) दिया है।‘
कुदरत भी कमाल है,मदन मोहन जी के पास एक गहरी सूझ थी..पिछले जन्मों की रूठी या अधूरी संगीत साधना थी जो बिना प्रयास बस बरसती थी…संगीत के बादशाह खय्याम जी के मदन जी बारे में विचार थे कि…वह संगीत के बेताज बादशाह थे। संगीत की‍ जितनी विविधताएँ होती हैं, उन सबका उन्हें गहरा ज्ञान एवं समझ थी। जबकि उन्होंने शास्त्रीय अथवा सुगम संगीत का बाकायदा कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था।
इनका वास्तविक नाम मदनमोहन कोहली था…दोस्तो । 93 हिंदी फिल्मों में एक से बढ़कर एक 612 गीत बनाने वाला मदनमोहन एक ज़िंदादिल इंसान था…वह जमकर क्रिकेट खेलते थे,खुद अनेकों पकवान बनाते थे…लेकिन एक ऐब था उनमे…वह खूब शराब पीते थे…बस यही शराब बहुत जल्दी उन्हें पी गयी और 14 अगस्त 1974 को उन्हें अपने साथ मौत के दरवाजे तक ले गयी…
एक हैरानी की बात है कि मदन ज़िंदा भी नही थे ,लेकिन 2004 में बनी फिल्म वीर-ज़ारा में मधुर संगीत बनकर नई पीढ़ी के होठों पे थिरक उठे…जी हां..इस फ़िल्म का संगीत उनकी बनाकर रखी हुई धुनों पे उनके बेटे संजीव कोहली ने सभी को सौगात के रूप में दिया…..आज भी देख लें वीर ज़ारा के sound track पे music by मदन मोहन लिखा है ।
मदन जी के संगीतबद्ध गीत मेरी भी एक बड़ी पसन्द हैं…अक्सर हम सबके होंठ हिल उठते है ,जब फ़िल्म मौसम का वो युगल गीत बज रहा होता है कि…

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई ,शिकवा तो नही…

या फिर फ़िल्म हंसते ज़ख्म की वो ग़ज़ल…
आज सोचा तो आंसू भर आए
मुद्दतें हो गयी मुस्कुराए…

राजकुमार राज,अमृतसर।

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