संघर्ष का छोर नही: एक दृष्टिपात by Dr.Purnima Rai

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संघर्ष का छोर नही: एक दृष्टिपात 
                         डॉ. पूर्णिमा राय
हिंदी साहित्य जगत में जाने पहचाने साहित्यकार डॉ. शुभदर्शन जी अपनी विशेष कलम के दम पर प्रसिद्ध  है। विगत कुछ वर्षो से मेरी पहचान डा. शुभदर्शन जी से उनके कार्यस्थल अमृतसर में हुई। एक आत्मीयता का भाव उनके संपर्क में आने पर प्राप्त हुआ। स्पष्टवादिता की भावना से सरावोर डा. शुभदर्शन जी मेरे लिए पूजनीय एक समान है। उनके व्यक्तिका साक्षात प्रभाव उनके द्वारा रचित संघर्ष का छोर नहीं काव्य संग्रह में दिखाई देता हैं। इस संग्रह को मैंने एक ही बैठक में यानि लगभग डेढ़ घंटे में पढ़ लिया। रचनाओं को पढ़ते समय किताब एक तरफ रखने का मन न हुआ। बिना किसी व्यवधान के मैं जैसे-जैसे कविताएं पढ़ रही थी, त्यों-त्यों लगता था, जैसे मैं डा. शुभदर्शन जी के जीवन आदर्शो से सामंजस्य बनाती जा रही हूँ। एक व्यक्ति का दर्द, समाज की स्थिति, रिश्तों की घुटन, संत्रास , हर कविता की गहराई में छिपा हुआ था। सच में लगता था कि यह जीवन, संघर्ष का निरंतर चलने वाला सिलसिला ही है। हर पल यह द्वन्द, संघर्ष किसी न किसी रुप में उत्पन्न होता है और एक चरम सीमा तक आकर कहीं व्यक्ति पर हावी हो जाता है तो कहीं व्यक्ति इस संघर्ष पर विजय पाकर सफलता के शिखर को प्राप्त करता है। यह संघर्ष, द्वन्द्व चाहे सामान्य आहमी है यां बुद्धिजीवी पुरूष है यां नारी, बच्चा है यां बूढ़ा, सभी के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इसके मार्ग से गुजरे बिना जीवन दुश्वार है। कहीं कवि ‘बहन की आँखें’ कविता के माध्यम से अपने पारिवारिक जीवन की वास्तविकता का यथार्थ  सामाजिकता से नाता जोड़ रहा है,तो वहीं बहन के प्रति अपनत्व भाव दर्शा कर उनके सानिन्ध्य से वंचित रहने की पीड़ा झेल रहा है। माँ जैसा कोई नहीं होता। माँ के जीवन दर्शन को चरितार्थ करती कविता ‘परंपरा का रथ’ अपने आप में बेजोड़ कविता है-
‘‘मेरी उम्र में
चली गई माँ
दुनियादारी के सब जंजाल काट
पर मैं
अभी तक थिरक रहा हूँ…….’’
माँ के जाने का दर्द और अपनी वर्तमान स्थिति में माँ को वापिस पाने की ललक साफ परिलक्षित होती है। वर्तमान जीवन की विसंगतियों का दिग्दर्शन भी कवि बाखूबी करता चला जा रहै है। निम्न पंक्तियां बहुत सुंदर बन पड़ी हैं-
‘‘फफोलों से चुभते हैं, अपने ही अरमान। ’’
आँख का मिजाज कविता पारंपरिक साहूकारों के संदर्भ को व्याख्यायित करने के साथ-साथ निर्धनता की वर्तमान तस्वीर कूड़ा बीनते हुए हाथों में स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है। आज हर आँख का मिजाज बदल गया है। कहीं ये आँख मतलबी है तो कहीं समाज के हित में उठी दिखाई देती है। मानव व पक्षी जगत के विभिन्न रूपों के माध्यम से आँख में आया बदलाव- करुणा, दया, स्वार्थप्रियता, प्रेम, तिरस्कार आदि को इंगित करता है। नीरसता की चक्की में पिसते ‘बेजान लोग’ कविता समय की मांग है। वीरों को मिला तिरस्कृत जीवन, नारी की होती दुर्दशा, चापलूसी के कीड़े बनकर नाडिय़ों में फैलती गंदगी ने मानव का हनन ही किया है।
बेटी की मायके के प्रति प्रेम भावना सच्चा उदाहरण ‘अरमानों की दीपावली’ कविता में लक्षित हुआ है। धार्मिक रंगत देने के यथार्थ को कविता ‘देवता का बुत’ में दिखाया गया है। कैसे भेड़ चाल की भांति पढ़े-लिखे वर्ग में भी मूर्खो का वास है, स्पष्ट दिखाई देता है। आज लोगों में दो चार ईंटें जोडक़र एक स्थान को धार्मिकता की चादर ओढ़ा देना और फिर धन कमाने की साजिश का प्रतिफलित होना, बाखूबी इस कविता में वर्णित है।
मानवता व इन्सानियत की दरो-दीवार से दूर होकर खड़े लोग कैसे रिश्तों को वापिस जोडक़र एक ही छत का निर्माण कर पाएंगें, इसकी पीड़ा ‘इक उम्मीद’ कविता के माध्यम से उभर कर सामने आई है। क्या कोई बूढ़े बीमार बाप की आवाज फिर से सुनेगा-कितना दर्द है-
‘‘खाँस रहे बाप की
लरजती आवाज तोड़ेगी
खामोशी’’
क्या उम्मीद की किरण फिर से रिश्तों को सहेज कर जिंदा कर पाएगी। एक विश्वास, आस की किरण कवि प्राकृतिक, रंगत में सामने लेकर आता है तो कविता ‘सूखा और बदली’ जन्म लेती है। प्राकृति यहाँ कवि की चिरपरिचिता लगती है। तभी वह मानव मन को भी ढाँढस देता है। जीवन-मृत्यु अवश्यंभावी है। जो जन्मा है, वह एख दिन भरेगा। यही सत्य है। ‘शिव बगिया से’ कविता में मृत्यु पर बहुत सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला गया है। संसार की निम्सारता, क्षण भंग्ररता के पलों में सूठी प्रतिष्ठा बनाए रखने वाले समाज के कर्णधार झूठे आँसुओं को आँखों में समेटकर श्रद्धा की फूल मालाएं भेंट करते हैं। —-
‘‘ फिर से नया बुत ढूंढने के
षडयंत्र में प्रयासरत’’झूठ की अमिट ध्वप छोडऩे को चढ़ाते हैं-
कलियों से बने कुछ फूल देते हैं श्रद्धांजलि..।
प्राकृति एवं पक्षी जगत से स्नेह भी कवि का अलग नहीं हुआ। पक्षी जीवन के कुशल विशेषज्ञ की भांति कवि पक्षियों के मर्म को, उनके संघर्ष को भी खूब जानता है। पक्षियों का कतारबद्ध उडऩा, जल्दी घर पहुंचने की ललक का दृश्य जहाँ खींचना मनभावन लगता हैं वहीं बच्चों का वृक्ष पर बने घोंसलें को छोडक़र उडऩे का मोह वृक्ष के दर्द को बयां करता है। मानव जीवन से साम्यता दिखाकर कवि ने सजग रचनाकार होने की भूमिका निभाई है। ‘खामोश है साथी’ कविता में व्यक्ति के जीवन साथी के खामोश, शांत व्यवहार का सटीक दिग्दर्शन हुआ है और बच्चे पक्षियों की भांति उडऩे को आतुर हैं। बच्चे व बीज, रक्तबीज, कविताएं रिश्तों की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालती है। प्राचीन आस्थाएं, विश्वासों में दरार आ गई है। जैसे पहले सस्सी, पुन्नू हुआ करते थे। आज वह सब कहां गायब हो गए ? परिवर्तन की लपेट में आया बिखराव ‘आस्थाओं का बिखरना’ कविता में झलकता है।
अधूरे मन की अतृप्ति ‘तुम ही तुम’ कविता में स्पष्ट दिखाई देती है जहां कवि चाहकर अपने प्रेम को अपने सपनों को, विस्मृत नहीं कर पाया। सब कुछ पाकर भी वह निश्चल प्रेम की चाह में लिप्त है।
‘जौहर तो जौहर’ कविता पारंपरिक, पृष्ठभूमि में वीरांगनाओं के जीवन इतिहास का वर्णन करते हुए समकालीन जीवन में माताओं के, नारी के जीवन बलिदान की कहानी को इंगित करती है- ‘नहीं यह जौहर नहीं’
गुलाम मानसिकता का अभिशाप है।
बदुपत्नीवाद, नारी के अहं को चोट पहुंचाता है, नारी को भोग्या समझना, वीर नारियों के इतिहास को पढ़ाना, पर आज नारी की हो रही दुर्दशा पर चुप्पी साध लेना, कवि को कचोटता है।
‘कमलगट्टा उदास है’ कविता के माध्यम से जीवन में उदासपन, नीरवता का संचार हरेक व्यक्ति को कचोटता है। अकेलेपन का संत्राप हर कोई झेल रहा है। चाहे वह मनुष्य है या प्रकृति। चाहे सजीव है या निर्जीव।
सपनों के हकीकत में न बदलने पर जो दर्द होता है, वह उदासी का मुख्य कारण है। यहीं कवि ने यह भी बताया कि सपने जब अधूरे रह जाएं, आपके द्वारा किया गया संघर्ष निष्फल हो जाए तो वह ‘आंतकी सपने’ बन जाते हैं। अर्थात् इंसान स्वार्थप्रिय, मतलबी होकर आंतक की ओर अग्रसर होने लगता है। क्यों कि तह वह अपने ऊपर संयम रखने पर अपने आपको बाधित नहीं करता पाता।
बाल मनोविज्ञान के जानकार साहित्यकार डा. शुभदर्शन  जी ने ‘‘बच्चा क्यों रोया’’ तथा ‘‘बच्चे को रोने न दो’’ कविता लिखकर व्यक्त किया है कि बच्चों से ही जीवन उज्जवल है। बच्चे ही देश के भावी कर्णधार है। ‘आंसुओं का हिसाब’ और ‘यहीं होना था’ कविता भी रिश्तों में आई नफरत की दीवार एवं वर्तमान मानव की स्वार्थप्रियता को पारंपरिक पात्रों- साहिबा-मिर्जा, सस्सी-पुन्नू के माध्यम से दर्शाता है।
‘संबंधों की तलाश’ कविता की निम्न पंक्तियाँ वर्तमान जीवन स्तर में आई गिरावट का साक्षात् नमूना है-‘‘दाऊ के मुष्ठि प्रहार के बिना ही
कैसे कर दिया
कंस ने- रक्तवमन
मौका पाते ही
तूने कर दिया
फसका सिर
धड़ से अलग
मैं अस्पताल की
शैय्या के गिर्द
बार-बार चक्कर
लगाने के बावजूद
नहीं उतार पाया
मामा को लगा आक्सीजन। ’’
दमित इच्छाओं से जीना आज वर्तमान में नियती बन चूका है क्योंकि भावनाएं पदार्थवादी प्रग में तिरोहित हो रही है।
‘‘कविता नहीं सवाल’’ शीर्षक कविता आज के सामाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक, धार्मिक जीवन पर करारा व्यंग्य है। एक-एक पंक्ति अपने आप में आज के जीवन की परतों को खोलती है। यहां कवि कविता न कहकर हरेक पंक्ति में सवाल खड़ा करता दिखाई दे रहा है।
…… ‘‘भेड़ समझ सराहते रहे
……. वर्षो
और
एक दिन  खाल बदलते वक्त तुम्हें उसमें छिपा…..
भेडियां दिख जाए ’’
बहुत सुंदर व सटीक अभिव्यक्ति है। पूरी कवित ने काव्य-संग्रह की शोभा बढ़ा दी है।
पंजाबी शब्दों की महक पंजाबी की धरती से ही आ सकती है। इसका सफल चित्रांकन ‘‘श्रद्धा का तर्पण ’’ शीर्षक कविता की आरंभिक पंक्तियों में उद्घाटित हुआ है। मातृभाषा के साथ-साथ, माँ की स्नेहमयी छाया को कवि ने अपने साथ सहेजकर रखा है।-
कितना फर्क है
मेरी और मेरे बच्चों की माँ में …….
इन पंक्तियों में कवि ने सारी वास्तविकता को खोल कर रख दिया जो इस कविता का मर्म है। आगे कवि कहता है-
‘‘पर संतोष है
विदेशियों में घिरा है
अभिमन्यु की तरह
अपने में नहीं……’’ ये पंक्तियां डॉ. शुभदर्शन जी के बेहतरीन रचनाकार होने की गवाही देती हैं।
बेटियों पर हो रहे जुर्म ‘‘ रो रही है लडक़ी’’ कविता में वर्णित है। चिडिय़ा के साथ साम्पता बताकर कवि लडक़ी के जीवन को प्रकट करता है-
‘‘ चुप बैठी है चिडिय़ा
गुमसुम है लडक़ी
आत्मा पर बोझ लिए। ’’
न्यायप्रियता का ढोंग ‘गीता की कसम’ कविता की निम्न पंक्तियाँ इंगित करती हैं-
—- ‘‘पुलिस के ब्यान में
इकबाल-ए-जुर्म कर लिया है
हरिया ने
नमक का हक है
सबसे ऊपर
बोल रहा है
अदालत में हरिया
गीता की कसम………’’
अपनी भारतीय संस्कृति में आज परिवर्तन को ‘संस्कृति का रास्ता ’ कविता वर्णित करती है-
‘बागी हो गया है
संस्कृति का रास्ता
लोहे-पत्थर में तबदील हो गया है
गाँव……….। ’
लौट रही प्रकृति कविता में अंधविश्वासों का जिक्र किया गया है जहां पत्थर पानी में तैरने लगते हैं। काला इल्म का लोगों पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक सोच तिलांजलि ही जा रही है।
‘‘मैं गांव लौटूंगा’’ कविता में कवि शहरीकरण, मानवीकरण, आधुनिककरण से असंतुष्ट है। आज वह अकेला नहीं है, भीड़ में है पर फिर भी वह अपनत्व उसके पास नहीं है,जो अपने गांव की भूमि की महक में मिलता था। जहां संस्कार थे, छलावा नहीं था। धन चाहे नहीं था पर प्रेम, अपनत्व था।
‘‘संघर्ष तो करना होगा’’ कविता इस संग्रह की यद्यपि अंतिम कविता है। तथापि काव्य संग्रह का सारांश भी यहीं कविता लगती है। यहां कवि शहर के आधुनिकता भरे जीवन से तृप्त नहीं है। लोगों के आपसी व्यवहार से असंतुष्ट है। यहां कवि प्रेरणा देता दिखाई देता है कि अगर अपने अस्तित्व को बचाना है,तो स्वयं हक के लिए संघर्ष करना होगा। क्योंकि आज हरेक क्षेत्र- कला, समाज, साहित्य, धर्म, शिक्षा में गिरावट आ चुकी है। जो भी अपने हित खातिर आवाज नहीं उठाएगा उसका अंत निश्चित है।
‘‘संघर्ष तो करना होगा
करनी होगी बगावत
मुठ्ठी भर आकाश से
उकाबी प_ों की मार पर
विभिन्न वादों के जाल में
ज$कड़ के अपने
सियासती षडयंत्रों में लीन

झंडाबरादरी के स्वार्थी पंखों से
बढ़ रहे अंधेरे के खिलाफ ’’
अंत: ‘‘संघर्ष का छोर नहीं ’’ 140 पृष्ठ का 55 कविताओं का काव्य संग्रह डा. शुभदर्शन की वैचारिक सोच एवं यथार्थ अनुभवों का जीता जागता दिग्दर्शन है।


       डॉ. पूर्णिमा राय
      शिक्षिका एवं लेखिका
drpurnima01.dpr@gmail.com
                         
                        
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