मुसल्सल दिल पे चलती आरियाँ हैं!!

1
85
ग़ज़ल
उन्हें मिलने में कुछ दुश्वारियां हैं।
मगर अपनी भी तो खुद्दारियाँ हैं।।
हवाओं को न आने दो यहाँ तक।
सुलगती राख में चिंगारियाँ हैं।।
उन्हें देखूं , निहारें ग़ैर को वो।
अजब उनमें छुपी मक्कारियाँ हैं।।
बुरों को भी बना डालें वो अच्छा।
यही अच्छों की ज़िम्मेदारियाँ हैं।।
उसी घर में सदा पाओगे रौनक़।
जहाँ बच्चों की ही किलकारियाँ हैं।।
भला उन पर भरोसा कैसे करती ।
वफ़ादारों ने कीं गद्दारियाँ हैं।।
पड़ी हैं बेड़ियाँ पांवों में मेरे।
खुले हाथों की कुछ लचारियाँ हैं।।
दवाएँ मिल नही पाती हैं जिनकी।
जहाँ में ऐसी कुछ बीमारियाँ हैं।।
मुहब्बत में फ़ना कर दें जो ख़ुदको।
अभी दुनिया में ऐसी नारियाँ हैं।।
सरे इंसानियत झुकने न पाए।
यही हम सबकी ज़िम्मेदारियाँ हैं।।
मुहब्बत में हुई नाक़ाम जबसे।
मुसल्सल दिल पे चलती आरियाँ हैं।।
दुहाई “यास्मीं” देती हैं अक्सर।
बदन पर ज़ुल्म की जो धारियाँ हैं।

 

डॉ. यासमीन ख़ान 20-06-2018
Loading...
SHARE
Previous articleआस की डोर( चोका)by Dr.Purnima Rai
Next articleरिपोर्टर (संस्मरण) कमलेश भारतीय
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here