मित्रता ( विश्व पर्यावरण दिवस )विशेष by Dr.Purnima Rai

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मित्रता (कविता)

नहीं जाने दूँगा
अब कहीं ओर!
यूँ ही पकड़के रखूँगा
हाथों में हाथ!
ओ मेरे चितचोर,
तुम ही तो लाते हो
सदैव बादल घनघोर!!
सुबह ,दोपहर और साँझ
तुम्हारे साथ ही खिलता
मेरे मन का मोर!!
गहन रहस्य
प्रकृति का बता दूँ!
तेरी हरीतिमा से मैं
आँचल भू का सजा लूँ!
ओढ़ लूँ तेरा सौंदर्य
अपनी रग-रग में,
नैसगिर्क छटा
से मन धवल बना लूँ!
कस कर जकड़ लेना
अपनी आगोश में,
कहीं मेरी कामुकता ,लोलुपता
भंग न करे तेरी शालीनता,
तेरे सौंदर्य को!
इससे पहले आ ज़रा
निर्मलता और पवित्रता
के आलोक में
फैला दे अपने विस्तृत
स्वरूप को !
नगण्य मनुज व उसकी तुच्छ सोच
एवं क्षणभंगुर जीवन का
पर्दाफाश करके
बता दे —–
चिरकाल तक अमर अजर है —-
पेड़ और उसकी मित्रता ,
मानवता से ,
मानवीय जाति से
और
इंसानियत से !!


drpurnima01.dpr@gmail.com

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