माँ तुम्हें सलाम :विभिन्न रचनाकारों का कलाम (मातृदिवस पर विशेष)

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आज मातृ दिवस है,भारत माँ और
देश की हरेक माँ के चरणों में
शत शत वंदन !!
1*माँ की वंदना—-प्रमोद सनाढ़्य “प्रमोद”
राजसमन्द

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माँ मंदिर माँ रब की पूजा
आदर और सत्कार माँ
पाक पैगम्बर ख्वाजा का माँ
माँ मरियम का प्यार माँ
माँ तुलसी के छंद की धारा
श्री मद् गीता सार माँ
गुरुवाणी के शबद कीरतन
आयत की अशआर माँ

माँ संतो का सुर सन्देशा
सतकर्मों की सार है
माँ के चरणों मे ही बसता
जग का सुख संसार है
क्या सूरज क्या चंदा तारे
बिन माँ के लगते अंधियारे
माँ की सूरत “भोर का सूरज”
निशा नंदिनी रैन नजारे

माँ ही सागर बहती सरिता
शीतल जल की धार माँ
माँ मौजों का रुख समझाती
कश्ती की पतवार माँ
माँ का जीवन जलती ज्वाला
सावन भरी फुहार है
माँ की ममता के मौसम मे
पतझर भी गुलजार है

माँ दुर्गा माँ उमा गौरी
जय जगदम्बे पार्वती
माँ ही रंभा रमा राधिका
माँ ही सीता सरस्वती
माँ कलियो की कोमल पत्ती
माँ फूलों का हार है
माँ की सासें ही महकाती
घर आँगन का द्वार है

माँ दीये की जलती ज्वाला
पूजा वाली थाली माँ
सूनी लगती बिन ममता के
होली और दीवाली माँ
जो नित रोज सवेरे करते
माँ चरणों मे वंदन है
उनके सर का सेहरा बनते
अवध पति रघु नंदन है

आओ शीश झुका हम कर लें
माँ के चरणो मे वंदन
वंदन है माँ तेरी ममता
तेरी मूरत को वंदन
वंदन है माँ तेरा आँचल
पावन दामन को वंदन
हाथ जोड़ कर वंदन करते
माँ तेरा शत-शत अभिवंदन

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2*माँ (सुशील शर्मा)

कैसे कैसे मंजर नजर आते हैं।
जाने क्यों लोग माँ को छोड़ जाते हैं।

सारी दुनिया की बातें याद रहती हैं
कैसे लोग माँ को भूल जाते हैं।

तेरी सूरत में ईश्वर दिखाई देता है
देवता भी तुझे सर झुकाते हैं।

मेरे गाल पर तेरा हर एक बोसा
तेरी गोद में हम जन्नत पाते हैं।

तेरे परोसे बिना पेट नही भरता
यूँ तो हरदिन बहुत अच्छा खाते हैं।

हर खुशी में तू बहुत दूर होती है
हर गम में तुझे पास पाते हैं।

मेरे बचपन के सारे शैतानी चेहरे
तेरे चेहरे पर हरदम नजर आते हैं।

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3*.माँ (डॉ .शशि जोशी “शशी )
जी .जी .एच .एस .एस .बाँगीधार ,
सल्ट ,अल्मोडा (उत्तराखंड )

घर-भर की चिंता करे ,रखे न अपना ध्यान !
माँ के निश्छल प्रेम का ,कैसे करूँ बखान !
ईंट-पत्थरों का भवन,धरता नूतन रूप ,
माँ ही तो देती “शशी ” ,घर को “घर का रूप !
बच्चों की चिंता करे ,करे डाँट -फटकार !
माँ की झिड़की में छिपा ,मीठा -मीठा प्यार !
माँ कुमकुम ..माँ फूल है ,माँ बाती ..माँ तेल !
घर-भर को महका रही ,माँ सुगंधमय बेल !
अपने दुख -तकलीफ की ,उसे कहाँ परवाह ,
माँ वो सागर प्यार का ,मिले न जिसकी थाह !
माँ चंदा..माँ चाँदनी..माँ सूरज ..माँ धूप !
फैले हैं संसार में ,माँ के अद्भुत रूप !
माँ मूरत..माँ बन्दगी ..माँ कुमकुम ..माँ फूल !
माँ की ममता ही “शशी “सब धर्मों का मूल !
घुलकर जिनकी फिक्र में ,भरे नयन में नीर !
वो बच्चे पढ़ते कहाँ ,माँ के दिल की पीर !
फैल रहा संसार में ,स्वारथ का बाज़ार !
लेकिन है सच्चा “शशी “,माँ का निश्छल प्यार !
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4*मातृ दिवस पर गीत ( शोभित तिवारी सूर्य, धौरहरा खीरी)

जगत में प्यार सबसे माँ ,.सदा भरपूर करती है।
हमें चलना सिखाकर वह ,सभी दुख दूर करती है।

पढ़ाकर प्रेम की भाषा ,दिलाती जीत जीवन में
सुनाती है महाराणा ,शिवा के गीत जीवन में
हमारे मन की’ सब बातें हमेशा जान जाती है।
हमारी जिद सदा माता , जगत में मान जाती है।
न कोई जानता हमको , वही मशहूर करती है।
हमें चलना सिखाकर वो, सभी दुख दूर करती है।

हमारी सोच हरदम ही, यहाँ नादान रहती है।
अगर माँ साथ हो मंजिल , बहुत आसान रहती है।
*पिलाया दूध जब माँ ने,लगे जल है वो गंगें का।*
*सदा ऑचल मुझे *माँ का,लगे हिस्सा तिरंगे का।*
मिटाकर आँख का काजल ,नहीं बेनूर करती है।
हमें चलना सिखाकर वह ,सभी दुख दूर करती है।

अगर माँ साथ हो मेरे , कभी मैं रो नहीं सकता।
खिलाती हाथ से भोजन , मैं’ भूखा सो नहीं सकता।
चलाऊँ नाव जब बनती ,रही पतवार मेरी माँ।
पढ़ी मानस महाभारत ,उसी का सार मेरी माँ।
हमारा साथ देकर दुःख चकनाचूर करती है।
हमें चलना सिखाकर वह,सभी दुख दूर करती है।

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5* माँ का ताबीज़ जियाउल हक ,जैतपुर सारण बिहार
‘कौन-सी गुनाह मुझ से कल अंजाने में हो गया।
माँ जो तूने गले में बांधी थी ताबीज़, वह कहीं खो गया।

बहुत श्रधा से ताबीज़ तूने फकीर बाबा से बनवायी थी।
तेरे लाल सलामत रहे तूने यही दुआ मांग कर आयी थी।
फिर भी यह अनहोनी मेरे साथ कैसे हो गया।
माँ जो तूने गले में बांधी थी ताबीज़, वह कहीं खो गया।

उस ताबीज़ को मैं अपना एक चौकीदार ही समझा था।
अनहोनी को टालने वाला एक वफादार भी समझा था।
कल रात गले में टटोलते हुए यूँही तन्हाई में सो गया।
माँ जो तूने गले में बांधी थी ताबीज़, वह कहीं खो गया।

ताबीज़ की तन्हाई की कहानी क्या बयां करुँ।
जो छोड़ दिया साथ उसके फ़िक्र में वक्त क्या जया करूँ।
बस अफसोस इस बात की हैं याद में उसके मैं रो गया।
माँ जो तूने गले में बांधी थी ताबीज़, वह कहीं खो गया।
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6*मेरी माँ (‘डॉ. यासमीन ख़ान )

माँ तुम तो सृष्टि हो
दिव्य दृष्टि हो,
भांप लेती हो तन,मन के भाव सघन
आपके ममत्व ने मनुष्यता का अध्ययन किया है गहन,
अपने रक्त से सिंचित किया मुझे पल-पल
अभाव सहे मेरा जीवन बनाने को उज्ज्वल,
बेटी होने के अपराध पर…
हर दिन पड़ने वाली डांट खा लेती ख़ुद
जब फाड़ी जातीं मेरी किताबें कहकर
बेटी होती हैं पराया सुअर धन,बड़ी उलझन,
न पढ़ाओ इन्हें ,न बढ़ाओ इन्हें प्रतिपल
मेरे नैनों के नीर में,
गहरी अहसास की पीर में
मिल जाते तुम्हारे भी खारे चन्द बून्द,
जिनमें घुली रहती असीम प्यार की मिठास
खारे नयन नीर आपस मे मिलते ही
डबडबाई आंखों से हम दोनों देख के मुस्कुरा उठते,
उसी पल हो उठता नये इंक़लाबी ख़्यालों का संचार
नई आशा,अधिक पढ़ने का
गति से हो जाता फिर विस्तार।
मेरे हर काम मे तुम रहती मेरे साथ
जीवन जीने की सिखाती शह और मात,
इंसानियत, भाईचारा, बैर से परे होकर जीना
रहना सिखाना ही तुम्हारा रहा धर्म।
बेगम होकर भी तुम्हारा दिल रहा सूफ़ी,सन्त
बुरा करने वालों को भी प्यार दिया अनन्त।
माँ तुम ही सिखातीं मुझे क्षत्राणी के सब गुण
वंश की परम्पराएं और मान,सम्मान की रक्षा
ठकुराइन की गरिमा,चुंडावत का गौरवमयी इतिहास
मुझमें भर देतीं बेइंतिहा राष्ट्र् भक्ति, ऊर्जा, दुलार
राजस्थान का शौर्य और त्याग,
जिज्ञासा की आग।
दोनों माताओं के साये में मैं नन्ही सी कोमल लता
धीरे धीरे बढ़ रही हूँ,
ले रहे हैं संस्कार विस्तार,
माँ तुम ही हो जीवन का सार
सींच रहा है मुझे तुम्हारा स्नेह अपार।
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7* मेरी माँ (सत्या शर्मा ” कीर्ति “)

आज अचानक जब कहा
मेरी माँ ने मुझसे
लिखो ना मेरे ऊपर भी कोई कविता
और फिर ध्यान से देखा मैंने माँ को आज कई दिनों बाद ।

अरे ! चौंक सी गयी मैं
माँ कब बूढ़ी हो गयी
सौंदर्य से दमकता उनका
वो चेहरा जाने कब ढँक गया झुर्रियों से

माँ के सुंदर लम्बे काले बाल
कब हो गए सफेद
कब माँ के मजबूत कंधे
झुक से गए समय की बोझ से।

अचंभित हूँ मैं …

ढूँढती रही मैं नदियों , पहाड़ों ,
बगीचों में कविता और मेरी माँ
मेरे ही आँखों के सामने होते रही बूढ़ी।

भागती रही भावों की खोज में
खोजती रही संवेदनाएँ
पर देख नहीं पाई जब
प्रकृति खींच रही थी
माँ के जिस्म पर अनेकों रेखाएं ..

सिकुड़ती जा रही थी माँ
तन से और मन से
और मैं ढूंढ रही थी प्रकृति में
अपनी लेखनी के लिए शब्द ।

जब बूढी आँखे और थरथराते हाथों से
जाने कितनी आशीषें लुटा रही थी माँ ।
तब मैं दूसरों के मनोभावों में ढूंढ रही थी कविता ।

और इसी बीच जाने कब मेरे और मेरी कविता के बीच बूढी हो गयी माँ ।

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8*”माँ.. सब शब्दों का सार” (राजकुमार)

आज मां दिवस है
और…हां दिवस है..
क्योंकि वह कभी भी नाह ना बोली
मां जब भी बोली..केवल हां बोली
जब भी कुछ मांगा..तुरंत पाया
वह दौड़ी चली आई.. जब जब बुलाया
सभी माताएं ऐसी ही होती हैं
ऊर्जा से लबालब…स्नेह से भरी हुई
खुद की सेहत की,फिक्र ना करती
बस..बच्चे की सेहत के लिए डरी हुई..
सच पूछो तो..सुबह मीठा सा रिवायती चिल्लाती हैं..
सूरज को कान से पकड़कर आकाश में लाती हैं..
और फिर रसोई के जायकेदार रस में कहीं गुम सी हो जाती हैं..
सुबह से रात तलक..रोटियां सेंकती हैं
उनमे से चंद रोटियां पंछियों की तरफ फेंकती है…
मंदिर में सुबह शाम ज्योत जलाती हैं
आरती,प्रेयर,नमाज़ और अरदास बनकर…घर की सभी बलाएं..भगाती हैं..
कभी कपड़े धो रही होती हैं
कभी पकौड़े तल रही होती हैं
कभी पोछा लगा रही होती हैं..
तो कभी बच्चे का होमवर्क हल कर रही होती हैं..
घर का बजट बनाती है..शाम को तरकारी लाती है..
सारी थकावट दूर करने वाली
कड़क सी चाय भी बनाती है..
सूरज डूब जाता है..पर मां नही अस्त होती है..
जब सभी T.V देख रहे होते हैं
वह रसोई में व्यस्त होती है…
मां अमावस्या में भी चांदनी बनकर बिखर जाती है…
अस्त-व्यस्त बिस्तरों को..कायदे से लगाती है..
सुबह सबसे पहले जागने वाली मां
सबको बिस्तर तक पहुंचाती है..
और फिर अंत में..सभी बत्तियां खुद बुझाती है…
सच ही तो है…मां कभी खत्म न होने वाली ऊर्जा है..
मां लक्ष्मी है,अन्नपूर्णा है,शारदा है,शीतला है..और दुर्गा है..
मां सूरज की लाली है…मां चांद का शीतल नूर है…
मां ब्रह्मण्ड को चलाने वाला
परवरदिगार..हजूर है…

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9*मां (जूही, विशाखापट्टनम)

मां तुम बड़ी सुहावन हो
हम प्यासों का सावन हो
फूल हो,अक्षत, चन्दन हो
धूप ,आरती,पूजन हो।

हरा-भरा एक मधुबन हो
हम बच्चों की धड़कन हो
छूटा हुआ वो बचपन हो
प्यार भरा आलिंगन हो।

सुंदर सा तुम आंगन हो
देवी का तुम दर्पण हो
भावों का तुम बन्धन हो
त्याग,स्नेह,समर्पण हो।

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10*मां का वंदन(डॉ अरुण कुमार श्रीवास्तव अर्णव)

बच्चे खुश हैं दुआ से जिनकी ,
उन सब मां का वंदन है ।

गंगाजल सी पावन माँ है ,
अक्षत रोली चंदन है ।

आँचल में गम भी छिप जाते ,
जीवन को है आस नई ।

एक दिवस क्या सदा साल भर ,
माँ तेरा अभिनंदन है ।।

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11*”माँ “(रुबी प्रसाद ,सिलीगुड़ी)

कितना सुंदर एहसास है न_ #माँ” शब्द । घर में घुसते ही बिना किसी काम के भी जिसे बच्चें आवाज देते है जब तक वो न दिख जाये बस ढ़ूंढ़ते ही रहते है जो दिख जाये तो मानो शुकून सा मिल जाता है, झट से गोद में जा बैठ सारे दिन की बात बोलते रहते है । माँ भी निराली दुलार से निहारती सारी बातें गौर से सुनती रहती है और मन ही मन चाहती है वो बातें कभी खत्म ही न हो । पर बातें तो खत्म होनी ही है । बातें खत्म होते ही प्यार से गोद से उतार कपड़े बदल खाना खिलाती है । फिर होमवर्क और जाने कितने ही काम । सबकी जरुरत का ध्यान रखने वाली माँ कभी समय पर भले न सोती हो पर सबसे पहले उठ जरुर जाती है । उसके होने से ही घर में शुकून और प्यार का एहसास बना रहता है । हर अच्छी बात पर प्रोत्साहित करने वाली माँ अपने बच्चों की गलतियों को भी ढ़क लेती है व गलत उनके बच्चें है जानकर भी सबसे लड़ पड़ती है । माँ भले पैसें से गरीब हो पर अपने बच्चों को राजकुमार व राजकुमारी की तरह रखती है ।

“सच ऐसी होती है #माँ…….

माँ का वर्णन स्वंय ईश्वर भी नहीं कर सकते । ईश्वर कण कण में है पर हम उन्हें बस महसूस कर सकते है हमें प्यार देने के लिए उन्होंने माँ का सृजन किया । माँ ताउम्र कितने कष्ट उठाती है पर कभी उफ नहीं करती । गर बच्चें नालायक भी निकल जाये तो भी माँ उन्हें दुआएं ही देती है । तभी तो कहते है पुत्र पुत्री कपूत हो सकते है पर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती ।

मातृ दिवस पर कुछ पंक्तियाँ माँ को समर्पित…..

माँ निर्झर झरना है ।
ईश्वर की संरचना है ।
उससे ही अस्तित्व हमारा,
माँ अन्न पूर्णां है ।।

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संपादित डॉ पूर्णिमा राय 

 

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1 COMMENT

  1. मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!! सभी रचनाकारों की रचनाएँ अत्युत्तम हैं!!

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