बेबसी ज़िंदगी का हासिल है!

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बेबसी ज़िंदगी का हासिल है!
दूर कश्ती से’अब तो’ साहिल है!!
आसमां पर निगाह रखते जो!
आज उनके क़रीब मंज़िल है!!
मुंसिफ़ों क्यूँ सज़ा नहीं इसको!
वक्त ही आरज़ू का क़ातिल है!!
बात जिसकी जिगर पे वार करे!
आदमी वो यकीं के’ काबिल है!!
अब मुसाफ़िर दिखा हसीं मंज़र!
इस क़लम से तू’ माहे’-क़ामिल है!!
धर्मेन्द्र अरोड़ा मुसाफ़िर
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