वैशाखी: विवश सी है!!

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🇮🇳……राष्ट्र-चिंतन✍

वैशाखी या व्यथा??

वैशाखी..विवश सी है
सहमी सी है…
क्योंकि..एक नहीं..अनेकों डायर इकट्ठे हुए हैं….
कुछ धर्म,कुछ जाति और कुछ क्षेत्रवाद के नाम पर…
अनगिनत कायर इक्कठे हुए हैं…
जिस तरफ देखो..भागा भागी है,आग है…
यूं लग रहा है…पूरा मुल्क ही आज जलियांवाला बाग है…
लेकिन आज इस बाग में..भारतीय नहीं…
भस्मासुर हैं..
इक दूजे को भस्म कर देने को आतुर हैं…
आज इस बाग में एकता की नहीं..
अनेकता की दुहाई है…
आज इस मुल्क में..हर मजहब की..अलग सी परछाईं है…
इसी परछाईं की आड़ में
सियासतदान अपनी सियासत चमका रहा है..
और..मुल्क हर रोज काल के मुंह में जा रहा है…
निक्कमें नवाजे जा रहे हैं..
और..मेहनती तिल-तिल कर मर रहे हैं…
निवाले खिलाने वाले अन्नदाता….
आत्महत्या कर रहे हैं…
और…आम बाशिंदे ..चुप हैं ,या डर रहे हैं…
हड़तालें और बंद हो रहें हैं
कहीं आगजनी,कहीं धुआं हैं
कदम कदम पे ..
वो देखिये
कोई गहरा सा कुआं हैं…
ना बंदूक की गोली है
ना कोई लाठियां बरसा रहा है…
बिना सोचे समझे…हजूम देखो
कूदता जा रहा है..
आज डायर गोरे नहीं….
और ना ही डायर जनरल हैं…
आज डायर देसी हैं..और भृष्ट हुआ टिड्डी दल है…
कोई नीरव है,कोई सेंगर है..कोई माल्या है…
आह ! मेरे देश की फसलों को इन जैसों ने खा लिया है…
आज वैशाखी.. विवश सी है..कोई संताप कर रही है…
वो देखो हंसती गाती वैशाखी
आज आसिफा की लाश पे
विलाप कर रही है…
कितने डायर.. आज बिना बंदूक के….
कहर बरपा रहे हैं…
जगह-जगह पे जलियांवाला बाग बना कर…
उत्पात मचा रहे हैं…
आशा है कि कोई भगत,कोई ऊधम और कोई सराभा फिर से आएंगे….
और…इन जल रहे जलियावाले बागों की
मिट्टी ठंडी कर जाएंगे…
और फिर से ..
वही हंसती गाती खनकती वैशाखी…
ह्रदय से मुस्कुराएगी…
नौजवानों के चेहरे पे रंगत होगी…
और आसिफा..बेखौफ होकर
जंगल में कोई नया तराना गाएगी…
राज✍

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