आई वैशाखी,उड़ते पाखी!!by Dr.Purnima Rai

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 छंंद 
 आई वैशाखी,उड़ते पाखी
 फसलें भी लहराएं, 
रोम-रोम पुलकित,मनवा हर्षित
 सबको साथ नचाएं 
निर्मल मनभावन,सजता आँगन,
मिलकर जश्न मनाएं 
पंजाब हमारा,सबसे न्यारा
 जग को आज दिखाएं।।
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गीत 
वैशाखी की पावन बेला, मन में प्यार जगाती है।
नफरत छोड़ो मिलकर बैठो,मन तकरार मिटाती है।।
 
फसलें ऊँची प्यारी लगती,खेतों में हरियाली है;
कृषकों के जीवन में आई,देखो आज दीवाली है;
अन्न देवता के कारण ही ,जगती हर घर बाती है।।
 
युग द्रष्टा युग स्रष्टा गुरु ने ,खालस पंथ सजाया था;
पावन धाम आनन्दपुर में ही,अमृत पान कराया था;
 गुरु मर्यादा गुरु सिक्खी यह, सबके मन को भाती है।।
 
खूनी साका जलियाँवाला ,देखा मन अकुलाया था;
उजड़ गया था बाग सुनहरा ,फूल-फूल मुरझाया था;
वीर शहीदों की कुर्बानी, हमको याद दिलाती है।।
 
सुख-वैभव खुशहाली आए,धन-दौलत सौगात मिले;
नील गगन में दिखे “पूर्णिमा”,सोने जैसी रात खिले;
श्रम उद्यम से किस्मत चमके, वैशाखी बतलाती है।।
 
…डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
4/4/16  (11/4/16 टू टाईम्स प्रकाशित)
7087775713
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