हरिया( लघुकथा)

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हरिया( लघुकथा)

आज से पिछले चार महीने वाला वह दिन हरिया को बहुत याद आया, बिना खायें पीये जब शाम तक बैलों को भी बिना चारा पानी के खेत जोतता रह गया था। शाम में उसकी छोटी बेटी आकर बोली-“पापा खाना लाई हूँ, खा तो लीजिए।”
हरिया बोला-“बेटी खाना वापस ले जा, शाम को घर आकर खाता हूँ, थोड़ा सा और रह गया है खेत को बनाने के लिए, और नाँद में जाकर बैलों के लिए चारा लगा देना जल्दी, बहुत मेहनत करा दिया आज मैने इन बेचारों से।
और आज हरिया और उन बैलों की सारी मेहनत बेकार हो चुकी थी, हाई वोल्टेज बिजली का तार खेत में गिरने से आज पूरा फ़सल जल कर राख हो चुका था। आज केवल हरिया की ही नही बल्कि उन बैलों की भी आत्मा रो दी। हरिया की बिगड़ती हालत देख कर।

जियाउल हक
जैतपुर सारण बिहार

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