घर से लेकर विश्व की यह ओछी राजनीति…..

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घर से लेकर विश्व की यह ओछी राजनीति…..

दोस्तों,हम सब हमेशा से राजनीति के विकृत रूप को लेकर चिंतित रहते हैं और इसकी आलोचना में विश्व के प्रत्येक नागरिक का रोज थोड़ा-बहुत वक्त तो व्यतीत होता ही है…जहां भी राजनीति है,वहां कम या बेशी कोई-ना-कोई विकृतता है ही है,बेशक भारत के सन्दर्भ में यह स्थिति ज्यादा भयावह दिखाई देती है…मगर पूरे विश्व में राजनीति का रूप कमोबेश यही है कि वह स्वभाव से अहंकारी है,जैसा कि हम जानते हैं कि सत्ता ऐसी ही होती है,इसलिए समय-समय पर सत्ता का दंभ ही उसे सत्ता से बेदखल करता है,और उसकी जगह किसी और को आसीन कर देता है,और नयी सत्ता भी अगर वाही करती है तो उसका भी वही हश्र होता है !!
हम सब आलोचना-निंदा आदि तो बहुत करते हैं मगर इस चरित्र की बुनियाद में ही कहीं खोट है,ऐसा कभी सोच नहीं पाते….और दोस्तों मैं आपको बताऊँ कि इसकी बुनियाद हम-सब खुद हैं,और यह खोट दरअसल हमारे खुद के भीतर ही होती है,और चूँकि अपने भीतर झाँकने का रोग हममे से किसी को भी नहीं होता,सो यह सिलसिला चलता ही रहता है,और समय तथा हमारे चारित्रिक गुणों के अनुसार बढ़ता ही जाता है,यह जो आज की राजनीति का स्वरुप है,यह एक-के-बाद-एक क्रमशः आती गयी विसंगति का ही एक उदाहरण है !!
और आपको सच बताऊँ,यह हमारे खुद के घरों से ही शुरू होती है !!अपने घर में भी तो हम यही किया करते हैं,किसी को नीचा दिखाना,कमजोर को शर्मिन्दा करना,जिसे आप पसंद ना करते हों,उसे दूसरों का भी नापसंद बनाने की चेष्टा करना,अपने धन और ताकत के बूते तरह-तरह के श्रेय ले लेना,और अधिकाँश समय अपने अहंकार की वजह से खुद के गलत होने पर भी दूसरों को गलत ठहराना,क्यूंकि आपके साथ घर के कुछ मजबूत सदस्यों का बहुमत है,और अपनी “बुद्धि”के बूते व्यापार में अपने ही “किसी” के साथ ठगी करके भी खुद महान बने रहना और दुसरे को चोर या डकैत साबित करना….यह सब घर रुपी देश में सत्ता रुपी ताकतवर लोगों का राजनितिक-कुटनीतिक प्रतिरूप होता है !!
और जाहिर है दोस्तों कि राज्य-देश या कहीं की भी सत्ता में सत्ताधारी लोग कहीं-किसी दुसरे ग्रह से तो आये नहीं होते….तो यह भी जाहिर है कि हमारा यही कुसंस्कार,हमारी यही हठधर्मिता,हमारा यही अहंकार हमारी राजनीति पर हावी हो जाता है,क्योंकि बेशिकाली हम वही हैं,जो कि हम अपने घर में हैं,या कि कहूँ कि अपने भीतर में हैं….तो यह जो राजनीति है,कहीं और से तो पैदा नहीं होती ना….हमारे ही भीतर से पैदा होती है…और हमारे भीतर से वही तो निकलेगा,जो दरअसल हमारे भीतर है…सो वो निकलता है और उसका भी वही होता है,जो हम सबके सामने हम-सबकी राजनीति के रूप में दिखाई पड़ता है…मगर स्वयं अपने दोष हम देख पायें,ऐसी हमारी फितरत ही कहाँ…सो राजनीति दिनप्रतिदिन ओछी होती जाती है और हम दूसरों को दोष देकर खुद को बरी कर लेते हैं…!!

~~~~राजीव थेपड़ा

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