लौट आओ!!

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*लौट आओ*

फिर से बगिया में
खिल उठे हैं
रंग -बिरंगे नाना फूल
एक मदमस्त
जानी -पहचानी सी महक
घुल गयी प्राणों में
पुलकित हो गया
रोम- रोम
उकर आई
कुछ स्मृतियाँ
मानस पटल पर
हो उठे उद्वेलित
मन के तार
बंद दृगों ने
लगाई पुकार
कहां हो तुम
‘लौट आओ ‘


*ऐसा क्यों*

बगिया के ये सुंदर
रंग बिरंगे फूल
सुरभित बयार
देते हैं मन को
कितना सकून
नयनों में लाते हैं
अद्भुत चमक‌
जीवन को कर देते हैं
आह्लादित
मगर
कुछ पल के लिए
और फिर
इनके शीघ्र ही
मुरझाके
बिखर जाने के
ख्याल से
कांप जाती है रूह
— ऐसा क्यों???
सुमन सचदेवा

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