देश उबल रहा है!!

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देश उबल रहा है!!

देश उबल रहा है
कहीं क्रोध से ,कहीं विरोध से
कहीं अधिकारों के हनन से
कहीं भृष्टाचार के खनन से
केवल एक छीना-झपटी है
देश की विचारधारा गोल नही
बल्कि..चपटी है
तभी तो…हर कोने में
धर्म और वर्गों की भीड़ है
हर पंछी की अल्ग दिशा
और अल्ग सा नीड है..
सच पूछिए तो यह कोई राष्ट्रीय एकता नही
बल्कि…देश की रगों में पल रही पीड़ है..
अध्यापक गुरुकुलों के प्रांगणों से निकलकर सड़कों पर आ रहे हैं…
अधिकारों और कर्तव्यों की नसीहतें देने वाले..
अपने अधिकारों की छीनाझपटी के कारण..
उबल रहे हैं ,चिल्ला रहे है..
परीक्षा के पर्चे लीक हो रहे हैं
परीक्षा-प्रबन्ध वीक हो रहे हैं
देश का भावी भविष्य खौफ खा रहा है…
उबल रहा है..प्रश्न कर रहा है
अब..जय हिंद नही बुला रहा है
उबल रहा है दलित वर्ग
कि.. अधिकार छिन रहे
और..दूसरा कोई वर्ग
तर्क संग गुस्सा दिखा रहा है..
इस चपटी सी देश भूमि का
हर कोना तप रहा है…
कोई धर्म की ऊंची बातों की माला जप रहा है…
हर कोई अपनी डफली
सरेआम बजा रहा है…
और…मौसूल से 39 लड़कों का
जनाजा आ रहा है…
इस सिकते हुए देश से
जो रोटी गए थे कमाने…
चढ़ गए दरिंदो के हाथ
और लग गए ठिकाने…
बरसों से मर चुके थे..
पर आस आज टूटेगी…
परिजनों की सूखी आंख से
फिर अश्रु सरिता फूटेगी…
और चैनल उनके आंसू
दुनिया को दिखाएगा…
पीड़ा को बेचकर..टी आर पी भी बढ़ाएगा…
उबल रहे इस देश का कोई तो हल निकालो…
चिंतन करो..संसद में रोज
शोर तो ना डालो..
कभी गौर करना..संसद भवन
चपटा नही है..गोल है
सुनो देश के वारिसो..रहस्य यह अनमोल है..
मतभेद चाहे कोई भी हो
लेकिन उद्देश्य एक है…
और वो हमारी एकता..खत्म करो अनेकता…
उबल रहा यह देश..उफान पर है आ रहा…
यह भीड़भरा मुल्क…दिशाहीन होता जा रहा…
इस चपटी सी.. विचारधारा को
गोल करने का प्रयास करो..
उबल रहा देश…ना और सत्यनाश करो..


राजकुुमार

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