यथार्थ की दहलीज पर!

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यथार्थ-दर्शन (राजकुमार)
1*जनजीवन
पिछले 2 दिन से पड़ रही कड़ाके की ठंड ने आम जनजीवन को भी जैसे जाम सा करके रख दिया है…या यूं कह लें कि नया साल अपने साथ असीम ठिठुरन लेकर आया है…दोस्तो ! जीवन जीने की शैली जितनी सरल होती है ,जरा सा टेड़ा और संकरा रास्ता भी हौंसला पस्त कर देने में कसर बाकी नही छोड़ता..मोटी-मोटी जैकेट्स, रजाइयां/कम्बल और जलते हुए हीटर या आग जलाकर सरल जीवन जीने वाले लोगों से दूर भारत में पुरातन युग से साधुओं का एक ऐसा समाज भी है जिस पर किसी मौसम की कोई भी भयानक मार कोई असर नही डालती,ये लोग हिमालय के 0 डिग्री से भी कम वाले इलाकों में पाए जाते हैं..इन्हें हम नागा साधुओं के नाम से जानते है जिनके कि भारत में कुल 13 अखाड़े है..किसी भी नागा अखाड़े में किसी भी नए साधू को प्रवेश पाने के लिए कम से कम 6 से लेकर 12 बरस तक के अति कठिन ब्रह्मचर्य से गुजरना पड़ता है..जीते जी खुद को मृत समझकर खुद अपना पिंडदान करना पड़ता है..निर्वस्त्र रहना पड़ता है और दिन में केवल 1 बार भोजन करना होता है वो भी अधिक से अधिक 7 घरों से भिक्षा लेकर..अगर 7 घरों में से किसी भी घर से भिक्षा न मिले तो इन्हें 8वे घर पे दस्तक देने की आज्ञा नही है और ये भूखे सोते है…धरती इनका बिछौना होती है..स्वाभिमान उच्च कोटि का होता है और नियमो के अनुसार ये केवल साधू को ही प्रणाम करते है,फरसा या तलवार धारण करते है और हर सुबह नहा कर माथे पे तिलक और शरीर पे भस्म लगाते है…देखा जाए तो हमारी पुरातन धार्मिक पद्धति में नागा साधू एक उच्च कोटि की कमांडो श्रेणी का हिस्सा रहे है..आम व्यक्ति को केवल कुम्भ के मेले में नज़र आने वाली ये टोलियां जीवन को अति कठोरता से जीने की कला की आदी हो चुकी होती है…अतः धरती पे एक अति विशाल सरल जीवन जी रहे जनसमुदाय से दूर ये तुच्छ सी नागा साधुओं की श्रेणी कुदरत का एक इशारा है कि…
“सरल जीवन-शैली समाधान ढूंढने में सक्षम नही होती…केवल साधना ही हर समाधान की सरल प्राप्ति का साधन है “…..

2*प्रेम 

कल अथाह प्रेम में डूबे किसी प्रेमी ने अति भावुकतावश एक प्रश्न किया…शायद उसे सही उत्तर पाने की एक आशा थी…प्रश्न था
कि अगर प्रेमवश किसी को इंतहा तक याद करें और उसकी याद में आंसुओं का सावन अक्सर बरसने लगे तो.. क्या जिसके लिए आंसू बहते है उस तक प्रेम-प्रार्थनाएं पहुंचती है ??
यकायक मैंने उत्तर दिया कि…रसायन(chemistry) है..अगर मिलता हो तो याद किये जाने वाला व्यक्ति हिल उठता है…अगर बिल्कुल विपरीत हो तो बिल्कुल यह सावन वही सावन होता है जो किसी सूखे,बंजर और वीरान सहरा(रेगिस्थान) में बरसकर अपना वजूद समाप्त कर लेता है…और वहां पे एक तिनका भी अंकुरित नही होता…और सावन की बूंदे रेत के किसी गहरे आगोश में समाकर समाप्त हो जाती हैं….
“प्रेम में रसायन अगर मेल खाता हो तो बेशुमार गुलाब खिल उठते है..अन्यथा एक ओर से हो रहा धाराप्रवाह किसी एक ग्लेशियर को सुखा देने में सक्षम होता है ।”

3* निद्रा

सर्दियों की सुबह और बच्चों की गुनगुनी सी गहरी निद्रा…जिसे वे कभी भी त्यागना नही चाहते..माँ-बाप या घर के बड़े अगर जगाने का प्रयास करें तो विरोध करते है,गुस्सा दिखाते है और कभी कभार तो गुस्से में कुछ न कुछ बुड़बुड़ा भी देते है…
हे आत्मन ! मन भी बच्चों की भांति मधुर निद्रा में जीने का आदी होता है…संत, महात्मा,महा पुरुष या गुरु माता पिता की भांति जब भी इन्हें जगाने का यत्न करते है या करते रहे है तो उन्हें समस्त सोई मानसिक चेतना को जगाने के एवज में विरोध का सामना करना पड़ता है और उन्होंने भूतकाल सामना किया भी है…लेकिन अंततः किसी कवि के बोल कितने गहरे थे ,जिन्हें हम हिंदी में लिखे जाने वाले निबन्ध “प्रातःकाल की सैर” को आरम्भ करते वक्त लिखा करते थे….
उठ जाग मुसाफिर,भोर भई
अब रैन कहाँ जो सोवत है
जो सोवत है,वो खोवत है
जो जागत है,सो पावत है…
“जागरण ही जीवन का सत्य है और निद्रा मृत्यु है”…..

4*दृष्टि

आंखों की छोटी सी पुतलियों से अंदर का एक पूरा संसार रौशन हो उठता है…बात यहां पे आकर खत्म होती है कि हमने किस दृष्टि से किसी वस्तु,व्यक्ति या स्थान को अपने मानस पटल पे उतारा…. अक्सर अभागे होते हैं वो लोग जो अपनी दृष्टि होते हुए किसी दूसरे के दृष्टिकोण से अपना नज़रिया बनाते हैं….यहां शिक्षा और अनपढ़ता मायने नही रखती..क्योंकि ऐसे अभागे बड़ी गिनती में शिक्षित भी होते है…दृष्टि का कमाल देखिए कि…वही बाल-कृष्ण थे जिनमें यशोदा को पूर्ण ब्रह्मण्ड के दर्शन हुए और दूसरी तरह पूतना भी थी..जिसे बाल-कृष्ण एक तुच्छ से बालक नज़र आए…बस इसी संकीर्ण दृष्टिकोण(जो कि उसे कंस से मिला था)के कारण उस नन्हे कृष्ण ने एक ही घूट से उस विशाल पूतना के प्राण खींच लिए थे…अगर पूतना सच में कंस की दृष्टि से देखने की बजाय खुद की दृष्टि से कृष्ण को निहारती तो धन्य हो उठती…भग्यशाली गोपिका हो जाती…. हे आत्मन ! किसी को भी खुद की गहन दृष्टि से निहारकर कोई दृष्टिकोण बनाना..क्योंकि ईश्वर ने तुम्हे देखने के लिए दृष्टि दी है और दृष्टिकोण बनाने के 

 

5*पत्थर

ठहरे हुए तालाब में उछाला गया छोटा सा पत्थर इसमें चारो ओर लम्बी लहर की लकीर खींच देता है…जबकि बहती नदी में गिरा या गिराया गया पत्थर किसी भी लहर को पैदा करने में सक्षम नही होता, उल्टा नदी इसे बहाकर कहीं दूर छोड़ देती है…और सागर में गिरा या गिराया गया पत्थर अथाह गोते खाता हुआ किसी नामालूम गहराई में जाकर गिरता है….हे आत्मन ! खुद को मानसिक रूप से इतना मजबूत बना ले कि समाज की छोटी-मोटी बातें तेरा सकून छीनकर तेरे रास्ते में बाधा न बन पाएं…नेक नियती और मजबूत इरादों वाली ऐसी नदी बन जा कि समाज का विरोध ही तेरी शक्ति के विस्तार का साधन बन जाए…बस यहीं पे तू आत्मिक रूप से सागर के समान हो जाएगा…यह वो अवस्था होगी जिसमें कि तेरा विरोधी समाज तेरे विरुद्ध कोई भी कार्य करते हुए..खुद ही अपना वजूद खो बैठेगा…तेरे अंदर का आत्म… परमात्म को उपलब्ध होने लगेगा ।

 

 

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