नवरात्रि की हार्दिक बधाई !!

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1*नमो आदिशक्ति(डॉ नित्यानंद’नीरव)

 

नमो आदिशक्ति भवानी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

तू ही आदि माता तू ही सर्वशक्ति
तू ही मेरी पूजा तू ही मेरी भक्ति।
तू ही अर्चना अर्पणा भी तू ही हो
तू आराधना साधना भी तू ही हो।
नमो शैलपुत्री हिमानी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

देवों पे जब जब भी विपदा पड़ी हो
बनी कालिका चण्डिका बन लड़ी हो
पुकारूं तुम्हें आ उबारो मुझे भी
न जाने कहां मां मेरी तुम खड़ी हो
नमो चंद्र घंटे मृडानी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

कमण्डल करे है वसन श्वेत धारिण
लिए हस्त माला बनी ब्रह्म चारिण।
यमो तुम नमो तुम तपश्चारिणी हो
तू दुख दारुणि हो तू ही क्लेश हारिण।
हे कूष्मांडिका हे रूद्राणी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

खुले केश काले खड्ग हाथ में है
सदा सर्वदा सिद्धियां साथ में है
जय मां त्रिनेत्री जयतु कालरात्रि
सदा शुभ करी मैया तू  सिद्धिदात्री
हे काशीपुराधीश्वराणी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

मनुज देवता हों या हों मूढ़ ज्ञाता
शरण सब तुम्हारे हे स्कंद माता
तु कात्यायनी सर्व कल्याणकारी
तुम्हें पूजते सृष्टि कर्ता विधाता।
हे शिववामिनी शंकराणी नमामि
नमो मातु दुर्गे शिवानी नमामि।

2*नववर्ष (डॉ यासमीन ख़ान)

 चैत्र मासि जगत ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति।।

ब्रह्म पुराण के अनुसार जगत पिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन की थी।
*चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा, हिन्दू पंचांग के
अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का दिन, नव वर्ष का
पहला दिन,नवरात्रि का पहला दिन।*
ॠतुराज वसन्त प्रकृति को प्रेम में वशीभूत कर आगोश में भर कर दुलरा सहला चुका होता है।
प्रकृति ख़ुमार में होती है।
पेड़ों की शाखे नई लताएँ, पत्तियों,फूलो,मंजरियों से सज्जित होकर नए गहनों से लदी नारी की भाँति, इठला, इतरा,बलखा रही होती हैं, पौधे फूलों से लदे मचलते ,हिलते ,झूमते हैं । दिल की नटखट उद्दंड उमंगों की तरह। प्रकृति के मन में नई गुदगुदाती तरंगे पैदा होती हुई प्रतीत होती हैं। खेत सरसों के फूलों की चादर में लिपटे,आस पास खड़े लाल पलाश से ढके हुए पेड़ो को तिरछी चितवन से निहारते हैं। गेंहू के बाल शरारत से सखियों की
तरह हिल-हिल कर गले मिलते हुए हँसते हैं
जुगनू दूर से चुपके से झांकना शुरू करते हुए उड़ते हैं।
हवा उदारता से सृष्टि के बालों में कंघी करके छोटी गूँथती हुई, चाँदनी पुष्पों, फलों की गंध,मकरन्द से सनी और भी चमकीली गर्वीली लगती है।
*कोयल खुशी से बौराती मधुर गान गाती हुई।
मन,तन,ज़ेहन को आनन्दित,सम्मोहित, करती हैं।
लेखनी स्वयं मचल कर शब्दों का चुम्बन ले,आचमन करने लगती है प्रकृति की अभिनव, सुखद बेला 

 

3*आओ हम खुशियां मनाएँ (प्रमोद सनाढ्य )

आओ हम खुशियां मनाएँ
आया ये नव वर्ष है।
द्वार पर शुभकामनाएँ
लाया ये नव वर्ष है।।
लाई है नव चेतनाएँ
नव सुबह की प्रतिपदा।
पुष्प पल्लव से शुशोभित
हो रही नव सँपदा।।

नेह की निर्मल बयारों
का नवल स्पर्श है।
मुस्कुराती भारती के
भाल का उत्कर्ष है।।
मन में पावन कामनाएँ
भावना में हर्ष है
प्रीत के नव गीत गाता
आया ये नव वर्ष है।।

हो झँनकृत प्यार पुलकित
हो सुमंगल साधना
श्रेष्ठता की हर दिशा मे
हो सफल आराधना।।
भोर की नव रश्मियों से
हो रहा ये पथ प्रखर
नव कदम की राह मे
होती प्रफुल्लित ये डगर।।

झूमती फसलों की बाली
कर रहीं आकर्ष है
झाँकती फूलों की कलियाँ
मन बढाती हर्ष है।।
माटी की नई गंध लेकर
आया ये नव वर्ष है
द्वार पर शुभकामनाएं
लाया ये नव वर्ष है।।

4* हे ऋतुराज (सुशील शर्मा)

नील अम्बर का कटोरा
गेंहू की पकी बालियां
खेत जैसे थालियां
उमगता मन
हज़ार कष्टों में
एक खुशी
बसंत के आने की

परीक्षा देते बच्चे
डरे सहमे
केंद्र के अधीक्षक का
तना चेहरा
बाहर
झरते पत्ते
हर साल का चक्र
बसंत में व्यस्तता

नव पल्लवों से सुशोभित
टेसू का सिंदूरी रंग
जैसे वनदेवी के गालों पर
बिखरा गुलाल
बसंत की फगुनाई में
गरीब अमीर
भूलते अपने अपने कष्ट

होली बीत गई
रंग भी धूमिल होने लगे
मानवीय संबंधों के
अब नही है वो प्रगाढ़ता
रंग भी बदरंग है
ऋतुराज बसंत के।

ऋतुराज अब साहित्य में
सिमट गया है
बहुत सुंदर छंद है
गीत हैं नवगीत है
किन्तु संदर्भ
सरोकारों का
सीमित हो गया है
मन का बसंत
कहीं खो गया है।

सम्मानों का बसंत
स्वार्थों की डालियों पर
पैसे की थैलियों पर
रचनाओं में सिसकता
मंच पर बिकता
चरणों में झुकता
अपने आप में सम्मोहित है

हे ऋतुराज
कालिदास के कुमार संभव से
वर्तमान के छंदों में
तुम बिखरे पड़े हो
स्वर्गीय अलौकिक सुख
का काल्पनिक चित्र हो
काश कष्ट साध्य ग्राम्य जीवन में
साकार होते
कुछ भूखों का पेट भरते
नौजवानों को रोजगार देते
फिर में उन्मुक्त हो
तुम्हारे गीत गाता।

 

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