विडम्बना (लघुकथा)

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विडम्बना

“क्यों रे कल्लू !तेरी माँ आज काम पे क्यों नहीँ आई ?”
“कल शाम से बुखार में तप रही है बाबूजी !अगर आप दवाई के लिये कुछ पैसे एडवांस में दे दें तो …बड़ी मेहरबानी होगी बाबूजी ..!”
“चल साले ..! बड़ा आया एडवांस वाला !अब आज घर का काम कौन करेगा ?और हाँ ज्यादा चूं -चपड़ की ..या नखरे मारे तो काम से निकाल दूँगा …काम करने वालों की कोई कमी नहीँ है !..समझा ?..”
“जी बाबूजी !..”
आँसुओं को गले में गटकता रूँधे गले से वह बोला और किचन में बर्तन साफ़ करने चल दिया ।
भीतर से साहब की आवाज़ सुनाई दे रही थी ..-सुनो मालती !अपने वरुण के लिए पंडितजी ने उपाय बताया था कि 250 ग्राम बादाम चलते पानी में छोड़ देना ..इसका जिद्दीपन कम हो जाएगा !मैं कल शाम ही बादाम ले आया था !आज तुम याद से बहते पानी में उन्हें डाल देना और हाँ! रास्ते में पंडितजी को 1100 रुपए की दक्षिणा भी देते जाना !पूरी कुंडली देखी थी उन्होने ! ठीक है ?”
मालिक साहब पत्नी को हिदायतें देते जा रहे थे और कुंडली ..ग्रह ..नक्षत्र उपाय ..इन सबसे बेखबर कल्लू की भीगी आँखों में बीमार माँ का चेहरा झिलमिला रहा था !

(डॉ .शशि जोशी “शशी “
जी .जी .एच .एस .बाँगीधार ,सल्ट
अल्मोडा ,उत्तराखंड )

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