वो तो सपना था (लघुकथा)

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वो तो सपना था (लघुकथा)

यूं अचानक शशि को देखकरसकपका गयी, रिया! और डायरी को तकिये के नीचे छुपाने लगी । उसे यूं करता देख शशि मुस्कुरा दिया एवं बोला,”क्यों छुपा रही हो डायरी ? “मेरी बुराई लिख रही थी क्या डायरी में!
उसकी इस बात पर रिया झेंप सी गयी व मुश्किल से बोल पायी ,नहीं वो मैं, वो मैं ………

क्या वो मैं वो मैं । कहता पास आया रिया के और हाथ में ली हुई किताब उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला,” लो तुम्हारी वो मैं वो मैं का जबाब।” अब खोल कर पढ़ो भी, इस शानदार किताब को !जानती हो परसों ही प्रकाशित हुई और अब तक लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं ।

रचनाकार ने क्या खूब चित्रण किया है जीवन का, “वाह” ।
सच कहूं रिया मुझे तो प्यार हो गया है लिखने वाली से ,नाम में ही जादू है कहता शशि कनखियों से देख भी रहा था रिया को ,पर रिया तो मानो उसकी बात ही नहीं सुन रही थी । किताब के पन्नों को पलट-पलट ज्यों-ज्यों पढ़ रही थी झर झर आंसू  गिर रहे थे । अंत में रचनाकार का नाम पढ़ते ही मानो सब्र का बांध टूट सा गया व खड़ी हो सीने से लग बस इतना ही कह पायी ____
शशि पर” वो तो एक सपना था ” ।

जानता हूं पगली, तुम्हारे हर सपने को ।रोज तुम डायरी लिखती थी और चुपके से मैं पढ़ता था तुम्हारे साहित्य को लेकर जुड़ाव को देख मैं खुद को रोक न पाया और सपने को हकीकत का रुप दे दिया इस किताब के जरिये ।

वो सपना था पर ये हकीकत देखो किताब का नाम भी हकीकत रखा है मैनें ।अरे धड़ल्ले से बिक रही है किताब, मेरी लेखिका बीवी । कहता सर को चूमता शशि आखों में ढेर सारे प्यार लिये बोला चलो ,तुम्हारी इस हकीकत के लिए पार्टी तो बनती है क्यों?
उसके इस अंदाज पर शर्मा गयी रिया व दोनों हथेलियों से चेहरे को छुपा बोली “धत्त” व खुद को शशि से भीतर तक जुड़ी महसूूूस करके तैयार होने चल दी सपने से हकीकत में जीने के लिए।

रुबी प्रसाद
सिलीगुड़ी

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