“मन के किवाड़ खोलकर नारी करे सफर “”अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं “संपादित by Dr.Purnima Rai

1
360
“अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं “
“मन के किवाड़ खोलकर नारी करे सफर “


अचिन्त साहित्य विशेषांक 8 मार्च 2018

रचनाएँ एवं रचनाकार ——-
करो मत कैद,(डॉ .शशि जोशी “शशी )
स्त्री(सत्या शर्मा ” कीर्ति “)
नजराना प्यार का (अर्विना गहलोत ,दादरी यू पी)
कभी ना हारी हूँ (रेनू शर्मा )
मन का वैभव( संगीता पाठक,उझानी – बदायूँ-उप्र)
ग़ज़लें (डॉ०प्रतिभा ‘माही’ ,पंचकूला हरियाणा)
नर तुम्हें सदैव ही अभिमान रहा (अर्पणा संंत सिंह,जमशेदपुर)
नजराना प्यार का (अर्विना गहलोत ,दादरी यू पी)
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो (प्रणिता राकेश सेठिया *परी*)
सिसक रहा है कौन ? (रुबी प्रसाद ,सिलीगुड़ी)
नारी (प्रमोद सनाढ़्य “प्रमोद”राजसमन्द)
सबला नारी (अशोक गोयल पिलखुवा )
नारी का सम्मान( सुशील शर्मा )
नारी..तुम केवल श्रद्धा हो (राजकुमार ,अमृतसर)
लड़कियाँ भला करेंगी क्या ?(आभा सिंह ,जयपुर)
नारी दिवस (डॉ अरुण कुमार श्रीवास्तव “अर्णव”)
मौन( शशांक मिश्रा’सफ़ीर’,इलाहाबाद)
नारी तुम स्वतंत्र हो( सुशील शर्मा )
अगर नारी नहीं होती ( कैलाश सोनी सार्थक)
सुश्री जयललिता मनोज कुमार (चेन्नई)
ਕਦੋਂ ਉਤਰੇਗੀ ਨਵੀਂ ਸੋਚ(ਦੀਪਕ ਕੁਮਾਰ ,ਜਲੰਧਰ)
मशाल( कुमार गौरव ‘पागल’)
ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਹਕ ਦੇ ਲਈ ( ਡਾ.ਪੂਰਨਿਮਾ ਰਾਏ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ)
 नारी का अरमान है (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर )
संपादित( डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर )

1*”करो मत कैद,(डॉ .शशि जोशी “शशी )

रिवाजों और रस्मों के पुराने इन ठिकानों में ,
करो मत कैद हमको सोच के छोटे मकानों में !
सफ़र करने दो हमको ,ऊँचे -ऊँचे आसमानों में ,
लगाओ मत कोई बंधन हमारी इन उडानो में !
हुनर है ..हौसला है ..है लगन ..साहस “शशी ” हम में !
है ऊँचा आसमा हम में ,है महकी सी जमीं हम में !
“शशी “खुशबू हैं हम ..महाकायेंगे सारे ज़माने को ,
करो मत कैद हमको छोटे -छोटे फूलदानो में !
सफ़र करने दो हमको ऊँचे -ऊँचे आसमानों में !

2* ग़ज़ल (डॉ०प्रतिभा ‘माही’ ,पंचकूला हरियाणा)

उठाकर रुख से हर पर्दा नज़ारे सब दिखा दूँगी
समझना मत मुझे अबला कयामत मैं बुला दूँगी

भले कमज़ोर हूँ तन से मगर फौलाद सी हूँ मैं
दरिन्दों की हुकूमत को मैं माटी में मिला दूँगी

समझता है ख़ुदा खुदको कभी खुद से मिला है क्या
ख़ुदा की हर खुदाई का सबब सारा सिखा दूँगी

अरे इन्सां सँभल जा अब तुझे मौका मैं देती हूँ
नहीं सँभला अगर अब तू मैं तांडव आ रचा दूँगी

तेरी औकात क्या है सुन तुझे पैदा करे नारी।
वही नारी हूँ मैं ‘माही’ नया मंज़र सजा दूँगी।

3*   ग़ज़ल (डॉ०प्रतिभा ‘माही’ ,पंचकूला हरियाणा)
न थे पहले अकेले हम न तन्हा आज रहते हैं।
सुनो कुछ अनकहे किस्से, हमारे राज कहते हैं।

कभी शोला कभी शबनम कभी दुर्गा कभी काली ।
कयामत हैं ख़ुदा की हम अज़ूबे हाथ गहते हैं।

भरा है आज बेशक ये अधूरा जाम जीवन का।
इरादे हैं अटल अपने तभी तो दर्द सहते हैं।

अजी लाखों करोड़ों शब्द बैठे अर्थ को थामे ।
कभी दोहा कभी मुक्तक कभी ग़ज़लें भी कहते हैं।

फ़रिश्ता हैं वो ज़न्नत के ख़ुदा के अक्स में कोई।
फिज़ाओं से निराले हैं मेरी रग रग में बहते हैं।

अमानत हैं उसी की हम न भूलो साथ रहकर के।
मेरे ‘माही’ मेरे हमदम मेरे ही साथ रहते हैं।


4*नारी दिवस (डॉ अरुण कुमार श्रीवास्तव “अर्णव”)

एक दिवस देने चले ,नारी को सम्मान ।
समझ सके उसको नहीं ,ऐसे कृपानिधान ।।

माँ बेटी पत्नी बहिन ,उसके रूप अनेक ।
शिक्षित होकर दे रही ,विद्या बुद्धि विवेक ।।

पीड़ा से उसकी नहीं ,रहो कभी अनजान ।
नारी केवल चाहती ,खुद की इक पहचान ।।

अब सशक्त उसको करें ,रच दें स्वस्थ समाज ।
नारी बिन होता कहीं ,कभी सुखद आगाज ।।

उसकी ममता नेह ने ,करा सभी कुछ त्याग ।
थोड़ा सा सब दीजिये ,मन से भी अनुराग ।।

दिवस आपके हैं सभी ,नमन करें हम रोज ।
जीवन हो तुमसे सुखी ,दिखे सदा नव ओज ।।

5*हम हैं हिन्द की  सशक्त नारियाँ (मंजु गुप्ता)

ऊर्जावान भारत की हम हैं सशक्त नारियाँ
साहस से  लाँघी  हैं हमने चार दीवारियाँ
जल – थल – नभ पर हमने की पुरुषों से बराबरी
संविधान की समानता की हम हैं अधिकारी .
चुप रहो , सहो , कुछ न कहो की बेड़ियाँ तोड़ रहीं
अपनी गौरव गाथा खुद लिख के हवा का रुख मोड़ रहीं
आजादी की आवाज बन कर  अधिकार जता रहीं
स्वावलंबी बन के देश की तस्वीर बदल रहीं .
धड़कनों को धड़कनें देती हम  हिन्द की नारियाँ
बेटी बन के महकाती घर – जग – आँगन की क्यारियाँ
बहन बन के भाई की कलाई पर बाँधती हैं  राखी
ईश के रूप में धरती पर आती है  माँ हमारी
वक्त  आने पर बन जाती है झाँसी की रानी
अंगारों से भरी राहों पर बन जाती है दामिनी
सीता की धैर्य – क्षमा बन देती है अग्नि परीक्षा
आदिशक्ति बनके माता पूरी करती हर इच्छा .
नारी शक्ति रुढ़ियों की सीमा रेखा को है  लांघ रहीं
दृढ संकल्पों की शक्ति से असंभव को संभव कर रहीं
माटुंगा  स्टेशन पर सारे कर्मचारी  हैं नारियाँ
दंतेवाड़ा में ई रिक्शा चालक हैं आदिवासी नारियाँ .
वेद, पुराण , ग्रन्थ सारे गाते नारियों का बखान
नारी से ही नर हैं जन्मते ध्रुव , प्रह्लाद समान
नारी है रत्नों की खान करे न कोई  अपमान
आत्मबल के अंगद पाँव से बनाती जग में पहचान .
मुद्रा – उज्ज्वला योजना स्त्री सशक्तिकरण की  मिसाल
अबला नहीं सबला है प्रतिभाएं  उसकी बेमिसाल
गीता , सानिया , साइना,  सिन्धु , दीपा खेलों की शान
अवनि ,  भावना , मोहना ने थामी वायु सेना कमान
मैके को महका के बेटियाँ महकाती हैं ससुराल
बहन , बेटी ,माँ , पत्नी बन फर्ज निभाती सालोंसाल
दो वंश जोड़कर वंश वृद्धि  का मिला है वरदान .
कुल निशानी को खून से सींच के पालती है संतान
“ वाह बुमेनिया “ की बैंड बनाकर धूम मचा रहीं
“ सीमा भवानी “  के स्टंट से अपनी शक्ति दिखा रही
“ बेटी बचाओ – पढ़ाओ “ से डिजिटल भारत बना रही
उपहारों में “ राज श्री “ का मान – सम्मान पा  रहीं .
मंजिल पाने महिला सशक्तिकरण की दौड़ है जारी
हाशिए रही महिलाएँ विश्व पटल पर हैं  छा रहीं
देश की रक्षा हेतु वीर बालाएँ फौज में जा रहीं
वर्जनाएँ तोड़ कर कामयाबी का झंडा फहरा रहीं .
मीरा , सुभद्रा , महादेवी , अमृता की कलम गा रहीं
कलम उठा के अपना अस्तित्व “ मंजु “ जता रही
है ख्वाहिश मेरी मिट्टी मेरे वतन की मिट्टी में मिले
बेटी का ले के  पुनर्जन्म भारत माँ को लगाऊं गले .

6* नारी (प्रमोद सनाढ़्य “प्रमोद”राजसमन्द)

जीवन का संगीत है नारी
मधुर प्रीत का गीत है नारी
सत्कर्मो की सघन साधना
धैर्य,धरम की जीत है नारी

सहनशील,शालीन भरी ये
सत्कारों की रीत है नारी
सीरत और संस्कार सिखाती
मन भावन मन मीत है नारी

सोम्य,सुहानी, सुमन, सारिका
लजवन्ती श्रृंगारी नारी
त्याग, तपस्या की मूरत है
सूरत चाँद खुमारी नारी

कोमलता की कली कामिनी
कोकिल कंण्ठ कुमारी नारी
वन,उपवन,मधुबन,महकाती
फूलों की फुलवारी नारी

मन चंचल,चित्तचोर,पपीहा
तन केसर की क्यारी नारी
प्रीत,प्रेम की पावन धरणी
ममता की महतारी नारी

चटक,चंद्रिका,चमक,चांदनी
भोर किरण उजियारी नारी
ढली साँझ की सुरमई वेला
गौ धुली सी प्यारी नारी।।

7* नारी का सम्मान( सुशील शर्मा )

नारी का सम्मान ,बचाना धर्म हमारा।
सफल वही इंसान ,लगे नारी को प्यारा।
जीवन का आधार ,हमेशा नारी होती।
खुद को कर बलिदान ,घर परिवार संजोती।

नारी का अभिमान ,प्रेममय उसका घर है।
नारी का सम्मान ,जगत में उसका वर है।
नारी का बलिदान ,मिटा कर खुद की हस्ती।
कर देती आबाद ,सभी रिश्तों की बस्ती।

नारी को खुश रखो ,नहीं तो पछताओगे।
पा नारी का प्रेम, जगत से तर जाओगे।
नारी है अनमोल ,प्रेम सब इनसें करलो।
नारी सुख की खान ,ख़ुशी जीवन में भर लो।

8*नारी तुम स्वतंत्र हो( सुशील शर्मा )

नारी तुम स्वतंत्र हो।
जीवन धन यंत्र हो।
काल के कपाल पर
लिखा सुख मन्त्र हो।

सुरभित बनमाल हो।
जीवन की ताल हो।
मधु से सिंचित सी।
कविता कमाल हो।

जीवन की छाया हो।
मोह भरी माया हो।
हर पल जो साथ रहे।
प्रेमसिक्त साया हो।

माता का मान हो।
पिता का सम्मान हो।
पति की इज़्ज़त हो
रिश्तों की शान हो।

हर युग में पूजित हो।
पांच दिवस दूषित हो।
जीवन को अंकुर दे।
माँ बन कर उर्जित हो।

घर की मर्यादा हो।
प्रेम पूर्ण वादा हो।
प्रेम के  सानिध्य में
ख़ुशी का इरादा हो।

रंग भरी होली हो।
फगुनाई टोली हो।
प्रेम रस पगी सी
कोयल की बोली हो।

मन का अनुबंध हो।
प्रेम का प्रबंध हो।
जीवन को परिभाषित
करता निबंध हो।

9*लड़कियाँ भला करेंगी क्या ?(आभा सिंह ,जयपुर)

दूर क्षितिज पर
कोई चाह
सजा कर
अनुसंधानों के
नये आयाम
धरेंगी

धरती पर
इक फूल उगा कर
जीवन के
अनछुये कलेवर
तेवर नये-नये
पढ़ेंगी

माटी के दीप
जला आले में
सृजन के
ओर-छोर
हर ओर
गढ़ेंगी

अधूरे- पूरे
ख्वाबों से जुड़ कर
समेट कलेजा
उपलब्धियों के
विस्तृत आकाश
भरेंगी

बहुत कोशिशें हैं
उनके तरकश में
संधान के लिये
पंख सभी के हैं
वक्त आयेगा तो
उड़ जायेंगी
चमकेंगी

10**स्त्री* ( सत्या शर्मा कीर्ति)

कल मेरी कविता से निकल
कहा स्त्री ने
अहा ! कितना सुखद
कितनी तृप्ति
आओ तोड़ दें बंदिशें
हो जाएं मुक्त
गायें आजादी के मधुर गीत
और नाच उठी स्त्री
उन्मुक्त बहती नदी में
धोये अपने बाल
बादलों का लगाया काजल
टांक लिया जुड़े में
चाँद सितारों को
तेजस्वी स्त्री
दमकने लगी अपने
व्यक्तित्व और सौंदर्य की
आभा से
कुछ गीत गुनगुनाएं
मेरी कानों में
आगोश में लिया और
डबडबाई आँखों से देखा मुझे
स्नेह भरे हाँथ रखे मेरे सर पे
और पुनः समा गई
पन्नों में…
ताकि रच सके एक नया इतिहास
स्त्री की निखरते -दमकते
व्यक्तित्व का….

11* उन्मुक्त गगन में उड़ने दो (प्रणिता राकेश सेठिया *परी*)

तोड़ दो ये पिंजरे का बन्धन ,
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो ।
हम कहलाती है जब चिड़िया ,
हमको पर खोल चहकने दो ।।
आश्रय न देते हो कभी तुम तो ,
कभी नीड़ भी कटवा देते हो ।
जिगर का टुकड़ा बेटी कहने वालों ,
हमको भी तो कभी जीने दो ।।
तोड़ दो ये पिंजरे का बन्धन……

कब तक ऐसे आप हमारे अरमानों का ,
यूँ ही गला घोंट कर रौदेंगे ।
कभी भूखी प्यासी ,कभी दहेज़ की ,
बलि हम चढ़ जाएंगे ।।
कभी अपनी अस्मिता की खातिर ,
तार – तार हो जाएंगे ।
आखिर कब तक हम ऐसे पिंजरे की ,
कैद में होकर जी पाएंगे ।।
तोड़ दो ये पिंजरे का बन्धन………

क्या हमारा कोई वजूद नही है ,
या हममें जान नही है ।
जीवित है सिर्फ श्वास लेती ,
हम जिंदा लाश नही है ।।
हम बेटी है ,बहन है ,पत्नी है ,
माँ है हम अबला नही है ।
मौत सी पीड़ा सहकर हँसते जनते है ,
औलाद को हम निर्बला नही है ।।
तोड़ दो ये पिंजरे का बन्धन……..

तोड़ दो आज ये सारे बन्धन ,
पँख पसार उड़ने दो ।
अपने अरमानों के हमको ,
ताने -बाने अब बुनने दो ।।
जीवन से कुछ खुशियाँ ,
कुछ कलियां अब चुनने दो ।
बेटे और बेटी के भेद का ,
सिलसिला अब टूटने दो ।।
तोड़ दो ये पिंजरे का बंधन ….
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो ………
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो ……

12* अगर नारी नहीं होती ( कैलाश सोनी सार्थक)

अगर नारी नहीं होती बताओ सार क्या होता
कहाँ आदम भटकता यूँ तभी संसार क्या होता

बिना नारी लगे क्या फिर यही दुनिया सुहानी सी
बहारें झूमती क्या फिर नजर होती दिवानी सी
कहाँ पर ठौर होता फिर अकेला नर भला क्या है
बिना नारी इसी संसार का आधार क्या होता

कभी मासूम लगती है कभी है शेरनी जैसी
यही गुण नारियों में है ढले हर रूप में वैसी
नही बढती कभी दुनिया नही होते नजारे ये
अगर नारी नही होती यहाँ आकार क्या होता

यही परिवार की दाता यही संसार की दाता
नही सब लोग ये होते अगर होती नही माता
हमेशा दुख उठाने की कला नारी ने’सिखलाई
कहो माँ से बड़ा फिर तो यहाँ उपहार क्या होता

दिलों में रूप का जादू सदा नारी ने’दिखलाया
मुहब्बत से चले दुनिया यही नारी ने सिखलाया
बिना नारी मुहब्बत का चलन ये कौन बतलाता
अगर नारी नही होती बताओ प्यार क्या होता

बने बीवी दिखाए चांद तारे रोज शौहर को
कभी वो जंग लडती है दिखाती वीर जौहर को
न होती शायरा कोई न सुनते गीत प्यारे हम
अगर नारी न जन्मी हो तो’रचनाकार क्या होता

सदा नर रोज गाली दे जिसे खराब ही’बतलाए
लिखे कविताऐं’कवि सारे जिसे सुन कर हँसी आए
कदम रखती नही नारी अगर संसार में कह दो
कहे कैलाश कुदरत का कभी उपकार क्या होता

13* सबला नारी (अशोक गोयल पिलखुवा )

रही कभीअबला,पर सबला है अब नारी,
अब शोला है,नहीं रही वह लघु चिंगारी।

पुरूषों से आगे भी कदम बढ़ाए उसने,
वह भी सक्षम है वे काम दिखाए उसने,

उठी और खुद की है,बढ़ने की तैयारी।
रही कभी अबला,पर सबला है अब नारी।

शिक्षा का लो क्षेत्र,हौसला कभी न टूटा,
दोराहो,चौराहों पर भी लक्षय न छूटा,

हो कोई प्रतियोगिता ,उसने बाजी मारी।
अब शोला है,नहीं रही वह लघु चिनगारी।

अब गृहस्थ-चालन भी उसका हुआ सुसंस्कृत,
बच्चों का पालन- पोषण करती है विधिवत,

शेष परिजनों के हित भी,वह है सुखकारी।
अब शोला है,नहीं रही वह लघु चिनगारी।

जैसे-जैसे यह नव पीढ़ी,कदम बढ़ाती,
दोनो पहियों की उठान सम होती जाती,

हर बोझा खिंचवाया,हो कितना भी भारी।
रही कभी अबला ,पर सबला है अब नारी।

14*नारी..तुम केवल श्रद्धा हो (राजकुमार ,अमृतसर)

मेरे धर्मग्रन्थ कहते हैं
कि… तू शक्ति है
सत्य ही तो कहते हैं
तू शक्ति है
तभी तो इतना सहन कर सकती है..
तिल तिल कर जीती है
इच्छाओं का दहन करती है…
घर को मन्दिर बनाती है
कायदे से झाड़ू-पोछा करती है..
बर्तनों में जल भरती है..
कपड़े धोती है,सुखाती है..
सूर्य उदय संग जगती है
और चन्द्र के संग बतियाती है
सच ही तो है जननी
तू चैन कहाँ पाती है…
कभी चपाती सेकते हुए
हाथ तेरा सिकता है…
कभी तरकारी काटते हुए
उंगली तेरी कट जाती है…
हल्की सी..सी करती है
और पीड़ा को पी जाती है..
लेकिन आह ! ये व्यथा है तेरी
फिर भी दोषी कहलाती है
गर जिरह खुद की करनी चाहे
थप्पड़ और गाली खाती है…
डबडबाई सी आंखों से तू
दिनचर्या में लग जाती है…
जितना है तुमने सहन किया
उतना दिल किसी ने ना पाया
कभी घड़े में जिंदा दफनाई
कभी जलती चिता पे लिटाया..
इतने पे भी जब दिल ना भरा
बाजारों में भी नचवाया..
कभी कैद किया बुरखों में तुझे…
कभी गांव में नग्न है चलवाया
क्यों अग्नि परीक्षा लाज़मी थी?
परपंच सभी क्यों रचवाया…
हे नारी..तू दूध की गंगा है
हर जीवन..तेरे पथ से आया..
तेरी मिट्टी में समर्पण है
इसलिए.. सर्वस्व लुटाती है
काया की मिट्टी अर्पण कर
तू हवनकुंड बन जाती है…
सुंदर भावों की तू सरिता
हर भाव में कल कल गाती है..
तू सचमुच में शमां जैसी
जल कर..महफ़िल जो सजाती है…
यह दुनिया गर इक महफ़िल है..
तो नारी इसका नूर सुनो…
मुस्कान,बातें और खनक हंसी
महफ़िल को करे..भरपूर सुनो
इस खनक को खनखन बजने दो…
श्रृंगार है..इसको सजने दो
अम्बर सा इसे मुस्काने दो
मत रोको..पढ़ने जाने दो
जिस कौम की नारी पढ़ती है
वो कौम तरक्कियां करती है..
हर सफल पुरुष संग नारी है
नारी है सुलझा वक्त सुनो..
मक्के से उठी अज़ान है यह
औऱ अल्लाह का दस्तखत है सुनो….

15*कभी ना हारी हूँ (रेनू शर्मा )

हाँ, नारी हूँ
तभी तो नही हारी हूँ
एक नहीं अनेक रुपों की
मैं अधिकारी हूँ
शक्ति हूँ तो भक्ति भी हूँ
आस हूँ तो विश्वास हूँ
मर्यादा, लज्जा सब मेरे रूप
विद्या हूँ तो वाणी भी मैं हूं
सदियों से हर सम्मान की
अधिकारी हूँ
तू मान चाहे ना मान
मैं अन्याय का विरोध करती सीता हूँ
मुरली की धुन पर नृत्य करती राधिका हूँ
तो कभी माँ, बेटी,पत्नी,बहन बन घर की
जिम्मेदारियों को पूरी करती सबको खुश
रखती अपने दुःख, पीड़ा को
न देख पाने वाली गांधारी हूँ
पर हर मुश्किल हालात से
न हारने वाली आज की सशक्त नारी हूँ।

16*नजराना प्यार का (अर्विना गहलोत ,दादरी यू पी)

नारी गहरे सागर सी तुम इज्ज़त दे दो।
प्रेम ह्रदय तल में भारी तुम इज्ज़त दे दो।

मन में भरी वात्सल्य गगरी तुम इज्ज़त दे दो।
आंचल शीतल मन्द पवन तुम इज्ज़त दे दो।

प्रणय निवेदन स्वीकारकर तुम इज्ज़त दे दो।
न कहो कठोर वचन तुम इज्ज़त दे दो ।

इसका ह्रदय जैसे बालमन तुम इज्ज़त दे दो।
बोली जैसे सरगम तुम इज्ज़त दे दो ।

सपनों की नित नई उड़ान तुम इज्ज़त दे दो ।
इसने सपनों में रंग भरे तुम इज्ज़त दे दो।

हाथों ने इसके पकड़ी है कलम तुम इज्ज़त दे दो ।
ना मारो कोख में तुम इज्ज़त दे दो।

ईश्वर की अनमोल धरोहर तुम इज्ज़त दे दो।
नजराना प्यार का तुम इज्ज़त दे दो।

17* मशाल( कुमार गौरव ‘पागल’)
जब अबला थी नारी गुज़र गया वो साल,
जल रहा है अब एक नया विप्लव मशाल।

पहन कर चूड़ियाँ अब भर रही है उड़ान,
बेटों से ज्यादा वो बढ़ा रही है मान,
ख़्वाब सारे आज हकीकत में हैं बदले
सब जगह मिल रही आज नारी की मिसाल।
जल रहा है अब…….

आँखों में हया और दिल में ममता रखे,
जरूरत पड़ने पर ज्योति भी ज्वाला बने,
कभी गौरी बने कभी बन जाये चण्डी,
खेल या पढ़ाई चारों ओर है धमाल।
जल रहा है अब……

स्वर्ण अक्षरों में लिख रही है वो दास्तान,
जिन्दा है उनके अंदर आज स्वाभिमान,
परचम सारी दुनिया में लहरा रही है,
जग भर में नारी अब कर रही है कमाल।
जल रहा है अब…..

जब अबला थी नारी गुज़र गया वो साल,
जल रहा है अब एक नया विप्लव मशाल।

18*सिसक रहा है कौन ? (रुबी प्रसाद ,सिलीगुड़ी)

हर तरफ है फैली खुशहाली_ पर
,सिसक रहा है कौन ?
देखो आयी है ईद, होली व दिवाली _पर
, थक रहा है कौन ?
कर सबकी जरूरत पूरी मुसकुरा दी _पर
, तरस रहा है कौन ?
संघर्ष संघर्ष व बस संघर्ष_ पर दे खुशहाली
, ये हंस रहा है कौन ?
है सबके साथ हर पल पर है सदैव अकेली
, फिर भी चहक रहा है कौन ?
हो तो घर लगे मंदिर न हो तो खंडहर
, घर को स्वर्ग बना रहा है कौन ?
कौन शब्द में छिपा है एक मौन ।
उस मौन में है एक औरत जिसके आगे सबका अस्तित्व हो जाता है गौन ।।
बोलो कौन है? जो हर पल कर संघर्ष बांटती है में खुशी __
खुद सह लेती है हर दंश? बदले में देती है सबको खुशी__
वो है एक औरत___
जो न है केवल मां न बेटी न पत्नी ,
बल्कि है पूरी सृष्टि।
गर्व है कि मैं एक औरत हूं ____
जो लेती कुछ नहीं बल्कि बस देती ही हूं ।
जो खुशियाँ देती बदले में दुख सहती हूं ।
हां गर्व है मुझे कि मैं औरत हूं ___
जो बदी के बदले भी नेकी ही बोती हूं ।
घर बन जाता है स्वर्ग जब मैं होती हूं ।

 19*मन का वैभव( संगीता पाठक,उझानी – बदायूँ-उप्र)

किन किन राहों पर भटकी मैं सुख सपनों की खोज में।
मंजिल फिर भी मन की व्याकुल अपनेपन की मौज में।
थी अज्ञानी समझ न पाई जीवन अपना व्यर्थ किया।
सब कुछ मन के भीतर ही था फिर भी कुछ ना अर्थ किया।
हठधर्मी थी खोज रही थी अपनापन अनजान में।
मन का वैभव खोज रही थी जीवन के शमशान में।

अपनी ही परछाई से जब जूझ रही थी रोज मैं।
डाली फूलों की खुशबू की ढूँढ रही थी ओज मैं।
खतम नहीं हो पाया फिर भी जीवन का अध्याय कभी।
और नहीं मिल पाया अब तक ईश्वर का पर्याय कभी।
एकाकीपन को ही पाया बस मन ने वरदान में-
मन का वैभव खोज रही थी जीवन के शमशान में।

भूल रही है इसमें मन की ऐसी रखती सोच मैं।
अब नहीं फिर ऐसा होगा मन में रखती मोच मैं।
मन का जब सन्नाटा गूजें खामोशी भी बोलती।
सुख-दुख दोनों को उस पल में एक तराजू तोलती।
सुरभित सब सबंधी मिलते जीवन के उद्यान में-
मन का वैभव खोज रही थी जीवन के शमशान में।

20*मौन( शशांक मिश्रा’सफ़ीर’,इलाहाबाद)

आँगन से निकली हर चीख अब तक मौन है,
दब गई है घर की चाँद दीवारो में।
चूड़ियों ने बेडियो सा जकड़ लिया है,
अगर उठ रहे है हाथ बगावत में तो,
काफिलों से रुक कर देखता ये कौन है।
इतिहास के पन्नों में वर्णित नग्न आभूषित कला,
या वक्त के आगोस में सिमटी हुई बला।
देवियों सा जिसको पूजा कभी,
या महफ़िलो में जिसको नचाया गया।
क्या गंगा की अबभी वो पर्याय है,
बाजारों में जिसको सजाया गया?
एक अनजानी वस्तु सी जो कोने में पड़ी है।
तू पूछ उससे आज की वो कौन है।
क्यों अब तक वो इस तरह मौन है।

21*ਕਦੋਂ ਉਤਰੇਗੀ ਨਵੀਂ ਸੋਚ(ਦੀਪਕ ਕੁਮਾਰ ,ਜਲੰਧਰ)

ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਬੇੜੀਆਂ ਕੱਟੀਆਂ ਜਾ ਚੁੱਕੀਆਂ ਹਨ,
ਅਜਾਦੀ ਦੀ ਨਵੀਂ ਲਹਿਰ ਠਾਠਾਂ ਮਾਰ ਰਹੀ ਹੈ,
ਬੁਰਕਿਆਂ ਦੇ ਦਿਨ ਲੱਦ ਚੁੱਕੇ ਹਨ।
ਅਕਾਸ਼ ਵਲ ਪੁਲਾਂਘਾ ਪੁੱਟੀਆਂ ਜਾ ਚੁੱਕੀਆਂ ਹਨ।
ਪਰ ਬਹੁਤ ਕੁਝ ਹੋਣਾ ਬਾਕੀ ਹੈ•••••
ਨਿਰਭੈ ਵਰਗੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਝਿੰਝੋੜ ਦਿੰਦੀਆਂ ਹਨ,
ਖਿਲਦੀਆਂ ਕਲੀਆਂ ਦੀਆਂ ਲਾਸ਼ਾਂ ਤੜਫਾ ਦਿੰਦੀਆਂ ਹਨ।
ਦੇਵੀ ਵਾਂਗ ਪੂਜਣ ਦੀ ਪ੍ਰਥਾ ਤਾਂ ਜਰੂਰ ਚਲ ਰਹੀ,
ਕੁੱਖ ਵਿੱਚ ਦਮ ਘੁੱਟਣ ਦੀ ਹਨੇਰੀ ਹਾਲੇ ਵੀ ਠਲ ਨਹੀਂ ਰਹੀ,
ਬਰਾਬਰ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂ ਤਾਂ ਅੱਜੇ ਵੀ
ਕਰਤਵਾਂ ਦਾ ਪਲੜਾ ਔਰਤ ਵਲ ਹੀ ਭਾਰੀ ਹੈ।
ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਤਕੜੀ ਲਿਆਉਣੀ ਪਵੇਗੀ,
ਇਕ ਨਵੀਂ ਸੋਚ ਬਣਾਉਣੀ ਪਵੇਗੀ,
ਜੋ ਧਰਾਤਲ ਤੇ ਹੋਵੇਗੀ,
ਨਾਰਿਆਂ ਦਿਵਸਾਂ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਹੋਵੇਗੀ
ਨਵੇਕਲੇ ਖੰਭ ਜਦੋਂ ਫੈਲ ਜਾਣਗੇ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ,
ਉਸ ਦਿਨ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਹੋਵੇਗੀ ਅਜਾਦੀ।

22* नर तुम्हें सदैव ही अभिमान रहा (अर्पणा संंत सिंह,जमशेदपुर)

हे नर तुम्हें सदैव ही अभिमान रहा
यहीं नारी जीवन का त्रस्त रहा
सत्य युग हो
चाहे त्रेता
या फिर हो द्धापर
या कलयुग ही
यह त्रासदी युग युग में रहा
हे नर तुम्हें सदैव ही अभिमान रहा

इसका साक्षी
प्रमाण हैं
इतिहास के पन्नों में
अक्षर अक्षर में
शब्द शब्द में
वाक्यों का ही नहीं
बल्कि संपूर्ण पुस्तक का भी
यहीं सार रहा
हे नर तुम्हें सदैव ही अभिमान रहा

नारी जब भी करती है प्रेम
अपने अस्तित्व के अंश अंश से
निश्छल हृदय से
अंर्तमन से
तन से और
आत्मा से
उसका स्वाभिमान मर्यादा कर्त्तव्य से
बढकर प्रेम ही होता है
केवल प्रेम
किंतु तुम्हारें लिए सदैव ही अभिमान रहा

हे नर कभी तुमने मर्यादा के नाम पर
दिया वनवास मुझे
कभी कर्तव्यों के कारण
अजीवन प्रतीक्षा का संतप्त
कभी बांंटा भाईयों में
वचन के कारण
तो कभी हरण होने दिया वस्त्र को
नीति-नियम के कारण
कभी पथ्थर बनाया
सजा दिया दूसरे की पाप की
कभी अपने सम्मान के लिए
जौहर की वेदी पर बैठी
कभी सती हुई तेरे संग
तुमनें प्रेम में भी कर्तव्य समाज मर्यादा धर्म को प्रथामिकता दी
मैंने प्रत्येक युग में केवल प्रेम किया
किंतु तुम न कर सकें केवल प्रेम
तुम्हें प्रत्येक युग में अभिमान रहा

23*ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਹਕ ਦੇ ਲਈ ( ਡਾ.ਪੂਰਨਿਮਾ ਰਾਏ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ)

ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਹਕ ਦੇ ਲਈ ਅਜ ਲੜਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ ।
ਦੁੱਖ ਦੀ ਹਰ ਇਕ ਘੜੀ ਵਿੱਚ ਦੁੱਖ ਜਰਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ ।।

ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਜਜਬੇ ਅਗੇ ਗੋਡੇ ਟੇਕ ਹਾਕਮਾਂ
ਧੁਰ ਤੋਂ ਹੀ ਨੇ ਜੁਲਮ ਢਾਏ ਵਕਤ ਦੇ ਹਰ ਜਾਲਮਾਂ
ਕੌਮ ਦੀ ਖਾਤਿਰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸੂਲੀ ਚੜਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ।।
ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਹਕ ਦੇ ਲਈ ਅਜ ਲੜਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ ।

ਨਵਜੰਮੀ ਹਰ ਧੀ ਹੀ ਤਾਂ ਹੁਣ ਬਾਪ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਹੈ।
ਮੁੰਡਿਆਂ ਨਾਲੋਂ ਵੱਧ ਕੇ ਵੇਖੋ ਕੁੜੀਆਂ ਤੇ ਅਜ ਮਾਣ ਹੈ।
“ਪੂਰਨਿਮਾ “ਬਾਪੂ ਦੀ ਪਗ ਦੀ ਲਾਜ ਰਖਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ।।
ਔਰਤਾਂ ਦੇ ਹਕ ਦੇ ਲਈ ਅਜ ਲੜਣਾ ਸਿੱਖ ਲਈਏ ।

24*नारी का अरमान है (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर )

नारी अब अबला नहीं,रखती नर सा तेज।
हिम्मत से आगे बढ़े,छोड़ फूल सी सेज।।

हर मुश्किल आसान हो,नारी का हो संग।
प्रेम लुटाकर भर रही ,जीवन में नव रंग।।

विपदाओं के पार भी,है देखो संसार।
खुशियाँ आंगन में खिलें,नारी को दे प्यार।।

देवी ,चण्डी से बनी,नारी की पहचान।
नारी का अरमान है,बढ़े देश की शान।।

नारी का अपमान जो,करते हैं हर रोज।
अपनी हस्ती के लिए,घर की करते खोज।।

चाह करें जो पुत्र की,नारी को दें मान।
कन्या-पूजन से बने ,जग में पुरुष महान।।

अभिलाषा पूरी करें,बेटी को दें ज्ञान,
भारत माँ के मुख सजे,फिर सुन्दर मुस्कान।।

25*   सुश्री जयललिता   (मनोज कुमार चेन्नई )

सुश्री जयललिता का जन्म २४ फरवरी १९४८ को मैसूर के कोमरवल्ली गाँव में हुआ था. वे १९६० के मध्य में फ़िल्मी दुनिया में मशहूर हो गयी. अपने परिवार को चलाने के लिए उनकी माँ ने ही उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया. जयललिता ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और १९६१ से १९८० के बीच तमिल, तेलगु और कन्नड़ भाषा की १४० से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया. अपनी अदा और नृत्य के लिए उन्हें “तमिल सिनेमा की रानी” के नाम से जाना जाने लगा. उनकी अधिकांश फिल्में चर्चित फिल्म-स्टार एम. जी. रामचन्द्रन (एम. जी. आर.) के साथ ही है. उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय भी एम.जी. आर. को ही जाता है. १९८२ में जब एम.जी.आर. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने तो जयललिता भी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी में शामिल हो गयी. बाद में वे राजयसभा के लिए चुन ली गयी और १९८७ में एम.जी.आर. की मृत्यु के बाद उनकी राजनितिक पार्टी की कानूनी हकदार बन गयी. १९८९ में वे पार्टी की महासचिव बनाई गयी और “अम्मा या पुरचितलैवी (सम्राज्ञी) नाम से जानी जाने लगी. १९९१ में वे पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी. राजीव गांधी की हत्या के समय काँग्रेस और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का गठबन्धन था और तमिलनाडु में इस पार्टी को ३९ सीटों पर विजय मिली. १९९६ में वे दोबारा तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी और १९९५ में उन्होंने फोर्ड मोटर कम्पनी को तमिलनाडु में व्यापार स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया. उसके बाद हुंडई, बी. एम. डब्ल्यू, डेमलर, यामहा, रीनॉल्ट, निसान, मिट्सूबीसी, राइट आदि कम्पनियों को स्थापित कर तमिलनाडु को भारत का  “कार कैपिटल” बना दिया. उनके समय में अशोक लिलैण्ड, टैफे, टी.वी.एस. आदि कम्पनियों का भी बहुत विस्तार हुआ. किन्तु दुर्भाग्य से १९९६ के चुवान में उनकी पार्टी बुरी तरह हार गयी यहाँ तक की वे खुद का सीट भी नहीं बचा पायीं. राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कडगम की सरकार बनी और जयललिता पर विभिन्न आरोप लगाये गये. उन पर आय से अधिक सम्पत्ति रखने का भी मुकदमा दर्ज हुआ. १९९५ में उन्होंने सुधाकरण को अपना दत्तक पुत्र बनाया, शशिकला उनके राजनीतिक जीवन में बहुत नजदीकी और निर्णायक साबित हुई. २००१ में वह फिर से सत्ता में आ गयी. इस बार उन्होंने राज्य सरकार द्वारा संचालित “टांसि” (TANSI) की स्थापना की.

२०११ में वे तीसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी किन्तु आय से ज्यादा सम्पत्ति रखने के मामले में उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा और उन्होंने अपने करीबी पनीरसेवलम को मुख्यमंत्री बना दिया. २०१५ में वह फिर से सत्ता में आई. जयललिता ने महिलाओं के कल्याण के लिये कई ऐसी योजनाओं को कार्यान्वित किया जिसके लिये वे जन- जन की चहेती बन गई. “अम्मा मोबाइल, अम्मा वाटर बोतल, अम्मा नमक, अम्मा टी. वी., अम्मा कैन्टन, अम्मा स्कूटी आदि आदि. हर साल पोंगल में गरीबों को मुफ्त साड़ी-धोती, चावल, गुड़, गन्ना आदि बँटवाया करती थी, अगर किसी लड़की का तमिल नाम है तो उसे चार ग्राम सोने का आभूषण, शादी का खर्चा, सरकारी नौकरी आदि की सुविधा देती थी. जब भारत में आलू और प्याज की कीमत आसमान छू रही थी तो अम्मा जी ने महिलाओं की सहभागिता से कम कीमत पर सब्जी की दुकान खुलवा दिया. अम्मा फार्मेसी में दवा की कीमत से १५ प्रतिशत कम कीमत पर दवाई मिलती है. श्री जयललिता का जीवन एक खुली किताब है.  इस पुरुष-प्रधान समाज में भी इस अकेली महिला ने इतने संघर्ष किये, ये अपने आप में एक मिशाल है. सुश्री जयललिता अद्भुत प्रतिभा की धनी थीं और उनमें अदम्य साहस था, वे एक खुशमिजाज महिला थीं और उनके बिना  तमिलनाडु की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती है.

 ***********************************************

संपादित डॉ पूर्णिमा राय ,अमृतसर (पंजाब) ,7087775713

Loading...
SHARE
Previous articleਹਰ ਦਿਨ ਮਹਿਲਾ ਦਿਵਸ ਵਜੋਂ ਮਨਾਇਆ ਜਾਵੇ!!ਪੰਜਾਬੀ ਸਾਹਿਤ ਸਭਾ ਦਾ ਨਿਵੇਕਲਾ ਕਦਮ!!
Next articleवो तो सपना था (लघुकथा)
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

1 COMMENT

  1. बहुत अच्छी अच्छी रचनाओं को पढ़ने का अवसर मिला. सभी रचनाएँ एक से एक सुन्दर हैं। लेखकों/लेखिकाओं, कवियों/कवयित्रियों और सम्पादक मण्डल को बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here