विजेता हम ही होयेंगे!

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विजेता हम ही होयेंगे……!!!
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शिकस्तों से भरी गठरी नहीं हम सिर पे ढोयेंगे-
बचे कुछ स्वप्न हैं अब भी,जिन्हें हम फिर से बोयेंगे,
नयी फ़सलात् होंगी मेरे इन सपनों के बीजों से –
यकीं है,देर से ही हों, विजेता हम ही होयेंगे…..!!!

चुनेंगे राह हरदम इक नई हम लीक से हटकर-
जियेंगे कत्तई ना बीते दिन के दर्द से सटकर,
मेरी माला के मोती चाहे जितनी बार भी बिखरें-
मगर उन मोतियों को हम हज़ारो बार पोयेंगे।
विजेता हम ही होयेंगे…………!!!

जो बीती ज़िन्दगी अब तक,भला उससे शिकायत क्या-
मैं आवारा परिंदा हूँ, मेरी ख़ातिर रवायत क्या,
फ़लक छूने के अपने फ़ैसले पर हूँ सदा क़ायम-
हज़ारों बार टूटें फिर भी हम सपने सजोयेंगे।
विजेता हम ही होयेंगे……….!!!

ख़ुदा ने क्यूँ कहूँ कि जड़ दिये तक़दीर पे ताले-
ये क्या कम है कि उसने,मुझको दो-दो हाथ दे डाले,
इन्हीं पर कर भरोसा आज,दावा हम ये करते हैं-
कि जीते जी कभी भी भीड़ में हरगिज़ न खोयेंगे।
विजेता हम ही होयेंगे……….!!!

बहुत ही दिल दुःखाया हमने अपने जानिसारों का-
अभी है सूद बाक़ी प्यार का कुछ, अपने यारों का,
भगीरथ की तरह गंगा को अपने दिल में ला करके-
कई गुज़रे गुनाहों के निशां अब ‘राज’ धोयेंगे।
विजेता हम ही होयेंगे……….!!!

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राजेश्वर राय ‘दयानिधि’/ग़ाज़ियाबाद
8800201131/9540276160

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