प्रभु जी,तुम चंदन, हम पानी (संत रविदास जयंती पर विशेष)

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🌹प्रभु जी,तुम चंदन, हम पानी🌹
(संत रविदास जयंती पर विशेष)

कलसा कोख में सूरज उपजा…
नाम भयो रविदास…
खिली चांदनी..पूनम का चंदा…
और समय मधुमास..
पिता संतोख दास अति भोला…
जूतों का व्योपार…
कांशी नगर की बस्ती थी वो…
रहते जहां चमार…
राम राम को रटते-रटते
जूते गजब बनाता…
साधू, संत फकीर को रैदास…
मुफ्त जूते पहनाता…
चमड़े के व्योपार में उसने
पाया कंचन सोना…
जीवनसंगिनी सरस्वती थी
नाम था जिसका लोना…
रामानन्द के शिष्य बने
और कबीर इनके गुरुभाई…
संत शिरोमणी रविदास की…
इतनी उच्च कमाई…
ठाकुर जिनकी कुटिया बसते….
ऐसी अलख जगाई..
गिरिधर अपने की तलाश में…
मीरा चलकर आई…
मीरा के गुरु रविदास जी
दी मीरा को ज्योति…
गंगा जिनकी कुटिया बहती…
करती वास कठौती…
धन्य-धन्य गुरु रविदास
और तेरी अद्धभुत वाणी…
ठाकुर- प्रभु को सहज जो बोले..
“तुम चंदन हम पानी”
घर ही मंदिर, कर्म है तीर्थ
हर पल है मधुमास…
गृहस्थ निभाया सुंदरता से
पुत्र हुआ विजयदास…
रविदास की तुच्छ सी कुटिया…पर,कोई गया ना खाली…
संत शिरोमणी रवि था चमका…
बरस एक सौ इकतालीस..
राज✍
अमृृृतसर

(इस कविता के माध्यम से मैंने संत रविदास जी के पूर्ण परिवार और उनसे जुड़े विशेष संतो का ज़िक्र करके कुछ जानकारी देने का प्रयास किया है…आशा है आपको मेरा यह तुच्छ प्रयास जरूर पसंद आएगा 🙏🏻)

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