प्रजातंत्र

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प्रजातन्त्र

ये कैसा
प्रजातंत्र है
हर कोई बना बड़ा
स्वतंत्र है
हर कोई मार रहा यहाँ
स्वार्थ मंत्र है,

राजनीति से
नीति अब हुई
काफ़ूर
छीना झपटी में
व्यस्त हैं अब
  रहीम और सूर,

लालच ने हर
एक को घेरा
भारती की रक्षा को
कौन दे पहरा,

रक्षक भी बनने
को आतुर भक्षक
कैसे न करें
किसी पर शक
दिन में ही बिक
रहा देश
घूमें हैं गद्दार
दिशा चार
अपनों का बना
कर भेष,

आज़ादी के मतवालों की
तड़प रहीं आत्मा
ये देख–देख
ख़ुश होते हैं
एक थैली के चट्टे बट्टे
कालाबाज़ारी की
रोटी सेक-सेक

आओ रे वीर फिर से आज
सुभाष,आज़ाद,अशफ़ाक़,
बाल ,लाल ,पाल
खुदगर्ज़ी को मिटा
देश से प्रेम सिखा के कर
दो कमाल
ग़ुलामी में कैसे थे हम कैसा है
अब हाल
चिंतन,मनन के हैं
ये कुछ सवाल
ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर
हे! विवेक तू ही
अब निकाल।


डॉ.यासमीन ख़ान ,मेरठ

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