काव्य संग्रह” भाव सरिता” :एक अवलोकन(नीरजा मेहता)

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पुस्तक समीक्षा
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काव्य संग्रह– भाव सरिता
कवयित्री— मीनाक्षी सुकुमारन
प्रकाशक— उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ
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परिचय—
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उत्कर्ष प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कवयित्री मीनाक्षी सुकुमारन जी द्वारा रचित 96 पृष्ठ के इस काव्य संग्रह में 57 कविताएँ और 37 क्षणिकायें हैं। सभी रचनायें उत्तम कोटि की हैं, भावपूर्ण हैं और पाठक को तृप्त करने में सक्षम हैं। कवयित्री ने अपनी सशक्त लेखनी से एहसासों की ऐसी माला पिरोई है जो पाठक को बरबस अपनी ओर खींच लेता है। माँ शारदे को और परिवार व स्नेही जनों को समर्पित इस संग्रह के प्रारंभ में कवयित्री ने अपने मन की बात लिखी है। अपने परिचय से लेकर शिक्षा व कार्यक्षेत्र के साथ लेखन की दुनिया में आगमन और उसके विस्तार की कहानी कहती आपके मन की बात पाठकों को न सिर्फ आकर्षित करती है अपितु प्रेरणा भी देती है। वरिष्ठ साहित्यकार व समीक्षक डॉ सुधाकर आशावादी की भूमिका पढ़कर मीनाक्षी जी के समृद्ध सृजन की झलक मिल जाती है।

रचनाओं का भाव-पक्ष—:
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मन में जब जज़्बातों का समुन्दर लहराने लगता है तो मन की लेखनी से जो भी कागज़ पर उतरता है वो अंतःकरण की सच्चाई होती है और वही रचनाकार की पहचान होती है। रचनाकार की ये संवेदनात्मकता पाठक के दिल को छू जाती है और रचयिता के मर्म को प्रकट करती है। मीनाक्षी जी के काव्य में गहन संवेदना देखने को मिलती है, मानवीय मूल्यों की समझ स्पष्ट झलकती है और अपनी अनुभूतियों से समाज में सजगता लाने का खूबसूरत प्रयास उनके काव्य की देन है।

दुनिया पर करारा व्यंग्य करती उनकी ये पंक्तियाँ देखिए—

“है दुनिया बड़ी ही विचित्र
कौन कहाँ कब कैसे छल जाये
ये आभास भी नहीं हो पायेगा
इसलिए जागते रहो….”

इन्सान की मुख्य आवश्यकता ‘रोटी’ पर उनकी निम्न पंक्तियाँ उनके कोमल मन को दर्शाती हैं–

“कोई रोटी के लिए
दिन भर पसीना बहाता
कोई रोटी के लिए
दिन भर दूसरे को सताता….”

समाज के झूठे चेहरे को सामने लाते हुए कहती हैं—

“कहते हैं दर्पण
कभी झूठ नहीं बोलता
यदि हाँ तो फिर
क्यों नहीं दिखाता
ये असली चेहरा क्यों नहीं दिखाता
है कितना छल कपट…”

सिर्फ समाज की बुराइयाँ, भेद-भाव ही नहीं दर्शाये, कोमल भावों को भी अपने काव्य में स्थान दिया है। “पूछे हर बिटिया” कविता में बेटी के मन के भाव दिल को छू गए—

“पूछे हर बिटिया
के दिल की धड़कन
जिस घर खेला महका बचपन
खिले हुए बड़े अरमां सारे
भाभी बोले बोले
नहीं अब ये घर-परिवार उसका…”

इनके लेखन की विशेषता है कि कम शब्दों में बहुत गूढ़ बात कह जाती हैं। उनकी रचनाओं में संवेदनशीलता है, परिपक्वता है, दार्शनिकता है जो यथार्थ का बोध कराती है, विचारों में सशक्तता है

“गागर में सागर” वाली उक्ति चरितार्थ करती इनकी ये पंक्तियाँ सीधे मन में बस जाती हैं—-

“रोज़ टूटे विश्वास की डोर
रोज़ बदले स्नेह के अल्फाज़
रिश्ते के बदलते यूँ आयामों को
जीत लिखूँ या हार लिखूँ
सोचे दिल यही बारम्बार”

मीनाक्षी जी के लेखन में कहीं भी कृत्रिमता नहीं दिखती, अपने जज़्बात को बहुत ही सरल शब्दों में व्यक्त कर देती हैं जिसके कारण पाठक इनकी लेखनी को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाता। इनकी सरलता को व्यक्त करती ये पंक्तियाँ इनके कोमल मन को दर्शाती हैं—-

“कड़वा सच है ये
पर सच तो है
गलत को सही
सही को गलत
कभी कह न पाये
कभी सह न पाये….”

अपने मन की हसरत को भी वो दबा नहीं पाईं, बचपन में लौटने की चाहत उनकी मासूमियत उनकी सादगी का परिचायक है, उन्हीं के शब्दों में—

“लौटना चाहूँ फिर से बचपन की गलियों में
न कोई कलह
न कोई क्लेश
न कोई चाह
न कोई उदासी
न खोना न पाना
न हार न जीत
बस मासूम खेल खिलौने
और सबका दुलार।”

देश, धर्म, संस्कृति पर भी उनकी लेखनी ने सबको चेताया, संदेश दिया और मन की पीड़ा प्रकट की। एक सजग रचनाकार के रूप में मीनाक्षी जी ने यथार्थ से मुँह नहीं फेरा, उनकी लेखनी से निकले ये अल्फाज़ कितने सटीक हैं—

“कैसे कह दूँ राम
हुई सिर्फ गंगा मैली
जब हो चुकी
सभ्यता, संस्कृति, रिश्ते
सभी दूषित……”

मातृत्व को दर्शाती, ममता स्नेह से बेटे के लिए ह्रदय से निकली पंक्तियाँ पाठक के मन को छू जाती हैं—

“उजला-उजला
गोरा-गोरा है
तेरा मेरे लाडले
उतना ही पावन
शीतल तेरा मन….”

इसी प्रकार कई आयामों पर मीनाक्षी जी ने अपनी लेखनी चलाई और पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उनकी रचनाओं में विविधता है। जीवन के हर रंग को अपनी रचनाओं में स्थान दिया फिर चाहे वो प्रकृति हो, रिश्ते हों, आध्यात्म हो, देश हो, बचपन हो, नारी हो, सुख-दुःख हो, ममता हो, श्रृंगार हो, वियोग हो या मानव मन के उतरते-चढ़ते रूप हों। हर रंग में उनकी कविता मुखरित हुई है। अपनी लेखनी से भावों की जो निर्झरिणी बहाई है उसके लिए जितना लिखा जाए कम है।

रचनाओं में कला-पक्ष—:
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मीनाक्षी जी ने अपनी रचनाओं में छंदमुक्त विधा का प्रयोग किया है। लेखन की इस विधा में वो परिपूर्ण हैं, इस विधा में उनकी अच्छी पकड़ है जिसके कारण उनकी लिखी सभी रचनायें हृदयग्राही हैं। शब्दों और भावों का अद्भुत संगम है, बिम्बों से परिपूर्ण भाव प्रवाह है जो कविता को एक श्रृंखला में पिरोता है। सरल सहज भाषा सीधे पाठक के दिल तक पहुंचती है।

शब्दों की सरलता, मन की सहजता, शब्दों और भावों का संगम और प्रवाहयुक्त भावप्रवणता उन्हीं के शब्दों में देखिए—

“खुली किताब सा है व्यक्तित्व मेरा
कुछ भी छुपा नहीं
जो भाव चेहरे पर वही दिल में
जो बात होठों पर वही दिल में
इसलिए अक्सर
हाव-भाव चेहरे के
लोगों को दुःख दे जाते हैं
छुपाना नहीं आता
न दर्द अपना, न खुशी अपनी, न रोष अपना।”

उनकी रचनाओं में भाषा-शैली अत्यन्त सहज, सरल व बोधगम्य है। उनकी सरल व ग्राह्य शैली देखिये—

“न तोल मुझे भाषा के अलंकरण
छंद विधा मुक्तक
रदीफ़ काफ़िया के पैमानों पर
मैं तो सरल भावमय सरिता हूँ
एहसास बस कहती हूँ
अपनी शब्द तूलिका कलम से।”

कवयित्री ने किसी भी तरह के विधान में न बँधकर यथार्थ पर और स्वतंत्र सृजन किया है। मनन किया है, चिंतन किया है और फिर उसको शब्दों और भावों में गढ़ा है। उनकी रचनाओं में उनका भावुक मन पाठकों के समक्ष आया है। उनकी पुस्तक “भाव सरिता” सचमुच भावों की सरिता है जिसको पढ़ते-पढ़ते पाठक जज़्बातों में बह जाता है।

मैं संवेदनशील कवयित्री मीनाक्षी सुकुमारन को उनके इस काव्य संग्रह के लिए बहुत बहुत बधाई देती हूँ और इसी प्रकार सृजन करती रहें और अमूल्य पाठन सामग्री उपलब्ध कराती रहें यही कामना करती हूँ।

अनन्त स्नेह व शुभकामनाओं सहित—

नीरजा मेहता

नीरजा मेहता ‘कमलिनी’
लेखिका व कवयित्री
गाज़ियाबाद (यू.पी.)

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