परछाइयाँ !!

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समीक्ष्य कृति— परछाइयाँ (जीवन यात्रा संस्मरण)
कृतिकार— नीरजा मेहता ‘कमलिनी’
संस्करण— 2017
मूल्य–195/-
प्रकाशक— श्री सत्यम प्रकाशन, झुंझुनू (राजस्थान)

संस्मरण सदैव व्यक्ति के जीवन, व्यक्तित्व, अस्तित्व व जीवन शैली का सजीव अंग होते हैं। संस्मरण जीवन को ऊर्जा व गतिशीलता प्रदान करते हैं पर निष्पक्ष, निष्कपट व सत्यता से परिपूर्ण संस्मरण वही प्रस्तुत कर पाता है जिसका अंतर्मन परिशुद्ध हो और विचारों में निष्कलुषता विद्यमान हो क्योंकि जीवन में राग-द्वेष, सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, लोभ, मोह, क्रोध, अपनत्व सभी भावों का बसेरा होता है अतः परिशुद्धता के साथ ‘सम्यक स्मृतियों’ को बतौर संस्मरण संजोना व शब्दों के ताने-बाने में पिरोना निश्चित रूप से सहज सरल कार्य नहीं होता है पर नीरजा जी यह कार्य करने में इसलिए सफल सिद्ध हुईं हैं क्योंकि वह निरभिमानी, मृदुल, मिलनसार, विनम्र, सरल व जीवंत हैं तथा इनमें सकारात्मकता व ऊर्जस्विता कूट-कूट कर भरी हुई है। वो संवेदनशील भी हैं और भावप्रवण भी, वो परिपक्व भी हैं और अनुभवशील भी, वो विचारवान भी हैं तो ऊर्जावान भी, वो जीवंत हैं तो जिंदादिल भी, वो सृजनशील हैं तो रचनाधर्मी भी, वो लौकिक हैं तो आध्यात्मिक भी। निष्कर्ष यही है कि कमलिनी जी के संस्मरणों में एक शुचिता सन्निहित है जो हृदयस्पर्शी भी है।

नीरजा जी ने जीवन की लघु-वृहत, सामान्य-असामान्य, विशिष्ट-साधारण सभी प्रकार के प्रसंगों का पूरी साफ़गोई के साथ प्रस्तुत किया है। इन संस्मरणों में प्रेरणा भी है, चिंतन भी है, जीवनमूल्य भी है, संस्कार भी है, अनुशासन भी है और मार्गदर्शन भी। इन संस्मरणों में भावप्रवणता व्यापक रूप में विद्यमान है।

यह यथार्थ है कि संस्मरण अतीत की डायरी होते हैं अर्थात् जीवन के पृष्ठों को पलटकर देखना। ये पृष्ठ स्वाभाविक रूप में हर्ष-विषाद से भरे होने के कारण अहसासों, अनुभूतियों का खजाना होते हैं। यही कारण है कि नीरजा जी के ये संस्मरण हमें एक भावनात्मक आवेग देते हैं, हमें उद्वेलित करते हैं और हमें एक संवेदनात्मक चेतना भी प्रदान करते हैं।

यह एक सुखद अनुभूति का विषय है कि इस कृति “परछाइयाँ” में नीरजा जी ने जीवन के अनछुए, सुखद, भावपूर्ण, मार्मिक, जीवंत, हास, शोक, अपनीले, सपनीले सभी प्रकार के संस्मरणों अर्थात् प्रसंगों को शब्द देकर हम पाठकों तक पहुँचाया है।

विविध शीर्षकों से प्रस्तुत कुल पच्चीस संस्मरण पाठकों को भाते और लुभाते हैं। “आँखों देखी घटना, रंग बचपन के, परीक्षा कक्ष में नारेबाज़ी, अंतिम विदाई, पराये बने अपने, एक अनोखा रिश्ता, पिकनिक बनाम मस्ती, बेटी की विदाई, सफ़र पत्नी से माँ तक, जब मिली नई पहचान, विद्यालय की खट्टी-मीठी यादें, इतिहास की पुनरावृत्ति” ये संस्मरण विशेष बन पड़े हैं। भाषा की सरलता, भावों की मिठास, प्रस्तुतिकरण की विशिष्टता, संवेदनाओं का माधुर्य इन समस्त विशेषताओं ने इस कृति व इसके संस्मरणों को विशेष व सार्थक बना दिया है।

यह भी यथार्थ है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन की यादें संस्मरण, प्रसंग व वृत्तांत यदि सार्थक व वज़नदार हैं तो दूसरे के लिए जानकारीपरक, दिशानिर्देशक व सारगर्भित सिद्ध भी हो सकते हैं। वस्तुतः नीरजा जी के सृजन में एक सरसता है और सम्प्रेषणीयता का सामर्थ्य है इसीलिए ये संस्मरण हृदयस्पर्शिता की विशिष्टता से परिपूर्ण हैं। यह सच्चाई है कि जब किसी का लेखन, सृजन अनुशासित व संस्कारजन्य होता है तो वो रागात्मक अनुभूतियों से युक्त होने के कारण पाठक को न केवल आकर्षित करता है बल्कि प्रभावित भी करता है।

भावों का मीठापन जरा देखें– “जीवन में कई ऐसे पल आते हैं जो मन-मस्तिष्क पर एक छाप छोड़ जाते हैं। कितने अद्भुत पल होते हैं जो हमारे जीवन से जुड़ जाते हैं। वो पल हमेशा मन पर हावी रहते हैं और हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन जाते हैं।”

भाषा व भावों की ये सहजता निस्संदेह सरसता प्रदान करती है। प्रसंग सुखद अनुभूति से युक्त हैं। नीरजा जी ने अपने जीवन को, अहसासों को, चेतना को, वैचारिकता को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया है वो सराहनीय है। मैं नीरजा जी को उनके इस सार्थक लेखन के लिए बधाई देता हूँ व अभिनंदन करते हुए साधुवाद देता हूँ।

प्रो. शरद नारायण खरे
विभागाध्यक्ष इतिहास
शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय
मंडला (म.प्र.) — 481661
(मो.– 9425484382)

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