नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!

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नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!
रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!
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खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!
भरा ग़म है अगर  दिल में  बशर अच्छा नहीँ लगता!!
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रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो  ज़माने में!
सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!
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सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!
बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!
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सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!
गिले हों ज़िन्दगानी से सफ़र अच्छा नहीँ लगता!!
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ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!
इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!
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धर्मेन्द्र अरोड़ा “मुसाफ़िर”
(9034376051)

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