सेल्फी और सेल्फby Dr.Purnima Rai

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सेल्फी और सेल्फ(डॉ.पूर्णिमा राय)

आधुनिक स्मार्टफोन युग में दूसरों के समक्ष अपने सेल्फ के बाह्य रूप को प्रस्तुत करने का प्रस्फुटन सेल्फी है।मैं क्या हूँ और क्या दिखाना चाहता हूँ ?मैं कैसा हूँ और कैसा दिखता हूँ?इसी ऊहापोह में एवं एकान्त जीवन की घुटन में बाहरी अपनेपन और खुशी तथा आनंद के पलों को खोजते-खोजते मानव इतना मशीनी हो गया कि उसे इन्सानों से अधिक मोबाइल एवं इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों – ——- फेसबुक,वात्सैप,इनस्टाग्राम इत्यादि से अत्यधिक लगाव हो गया।ये लगाव एक सीमा तक जहाँ आनंददायक था,वहीं सीमा के अतिक्रमण होने पर यह मानव की असमय मौत का साधन भी बन गया।

हिंदुस्तान की आबादी 133 करोड़ के आस पास आ चुकी है और देश में मोबाइल की संख्या भी इसी के आस-पास है । देश में इस समय लगभग 120 करोड़ मोबाइल लोग का प्रयोग कर रहे हैं।लगभग 9.30 करोड़ सेल्फी हर दिन दुनिया में ली जाती है । भारत में ही नहीं हर देश में इसका प्रचलन खूब हो रहा है

आज चहुँ ओर नजर दौड़ायें तो सेल्फी की भरमार ही  नजर आ रही है। एक सर्वे केअनुसार पुरुष 20 सेकेंड से ज्यादा समय के लिये भी मोबाईल से दूर नहीं रह सकते। परन्तु महिलाओं की स्थिति इस मामले में पुरुषों से थोड़ी ठीक है। महिलाएं 1 मिनट से ज्यादा दूरी बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं। गूगल के एक सर्वे से जानकारी मिली है कि स्मार्टफोन के इस दौर में युवा वर्ग  दिन में 10 से ज्यादा घंटे अपने फोन के साथ बिताते हैं और 13 से 14 सेल्फी लेते हैं

बच्चे से बूढ़े सब सेल्फी खींच रहे हैं।आज एकल रुप में सेल्फी का प्रचलन पुरुष एवं स्त्री दोनों वर्गों में तो है ही ,साथ सामूहिक रुप में बेहतरीन एवं अलग अंदाज में खींची सेल्फी को समाचार पत्र के कॉलम में निशुल्क सजाया जाता है।स्नैपचैट,इन्सटाग्राम ,सोशल मीडिया के साथ-साथ और भी बहुत सी एप हैं जहाँ पर सेल्फी खींचते रंग बिरंगे रूप में चेहरे की बनावट को आकार दिया जा सकता है।अलग-अलग बालों के स्टाइल लगाकर खूबसूरती बढ़ाई जा सकती है।और चेहरे के हर नैन नक्श को नवीन रूप में ढाला जा सकता है ।स्मार्टफोन होना चाहिये बस आपके पास!घर में खाने को रोटी हो यां न हो चाहे!!

    प्रदर्शन करने की अंधाधुंध दौड़ में आज आम नागरिक भी बुरी तरह लिप्त हो गया है।पहले जहाँ अपने आपको सबके समक्ष अलग-अलग रूप में  दिखाना महज सैलेब्रेटी का ही अधिकार माना जाता था। देश का प्रधानमंत्री जो कार्य करेगा,जनता भी तो वही करेगी।प्रशासन एवं सत्ताधारी सेल्फी लेंगे तो युवा कैसे पीछे रहेंगे।नक्शेकदम पर चलना तो युवाओं का जन्म सिद्ध अधिकार है। किस का नाम लूँ किस का छोडूँ ..सब सेल्फी खींचना और दिखाना पसंद करने लगे हैं।सेल्फी से व्यक्ति अपने प्रति सजग रहने लगा है।  वे हर मिनट की सूचना दूसरों को सेल्फी के माध्यम से देता है ।वह अपनी अच्छी-अच्छी और खुश नजर आने वाली तस्वीरें पोस्ट करता है अब तो हमें रोने वाली सेल्फी भी दिखाई देने लग गई हैं अर्थात् मानव अपने मनोभावों को नियंत्रित नहीं कर पा रहा है।वह यह मनोभाव से जीने लगा है कि मैं ही बेस्ट हूँ।अभिप्राय यही हुआ कि वह सेल्फिश हो गया है।जब उसकी खींची सेल्फी की सराहना होती है तो वह अहं की लपेट में आ जाता है और जब कभी अवहेलना हो तो वह दूसरों को मूर्ख मानता है कि इन्हें क्या पता..सेल्फी होती क्या है??ऐसी भ्रम की स्थिति में जीने वाला व्यक्ति जब अत्यधिक वक्त मोबाइल,कैमरा,नेट,फोटो खींचना,पर व्यतीत करता है तब उसका विनाश होने लगता है और परिणाम आते है हमारे सामने समाचार पत्रों में छपी दुर्घटनाओं एवं न्यूज चैनल पर प्रसारित हो रही खबरों में!! अमुक स्थान पर मरते व्यक्ति की मौत का कारण बना सेल्फी लेना।सेल्फी खींचते वक्त गँवाई जान!सेल्फी ने डकार ली  नवयुवकों की जानें!सेल्फी का भूत सिर चढ़ा और चलती ट्रेन से गिरे लोग!पहाड़ों पर घूमने गये वापिस न आये सेल्फी की रह गई यादें!!शेर के संग लेने लगा सेल्फी ,खा गया शेर!न जाने क्या-क्या!भई,यह सेल्फी इश्क कैसा जो जीवन को ही डस ले!!”मानव जीवन दुर्लभ है देह न बारंबार”सबने सुना और पढ़ा है पर शायद अमल कोई कोई करता है।

समाज में कोई भी परिवर्तन यां नया कुछ देखता है तो  मानव झट से वह कार्य करना शुरु कर देता है।

आ.नरेन्द्र मोदी देश के वे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने इस तकनीकी का उपयोग किया है। हालांकि इसके पीछे डिजिटल इंडिया की उनकी सोच है। वैसे भी विदेशी दौरे पर भी सेल्फी लेना वे नहीं भूलते।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश जाते हैं तो कम से कम 2सेल्फ़ी लेते हैं।बराक ओबामा भी रोज़1सेल्फ़ी लेते हैं ।

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मैं तो कपिल शर्मा का कॉमेडी शो  खूब देखती हूँ,आज जब इस विषय पर लिख रही तों सोच रही हूँ कि कपिल शर्मा भी आने वाले मेहमानों के साथ सेल्फी खींचते हैं ।अब आप सोचिये कि उनका सेल्फी खींचना गल्त है ,मेरे विचार से तो हरगिज नहीं।क्योंकि वह आज चाहे एक प्रसिद्ध कलाकार बन गया हो पर उनकी जड़ों में आज भी भारतीय संस्कार हैं ।दूसरी बात वह सेल्फी एक ऐसे स्थल पर लेते हैं जहाँ कोई खतरा नहीं ।और न ही किसी को कोई क्षति हो सकती वहाँ। अभी हाल ही में मेकअप विदाऊट सेल्फी का प्रचलन फेसबुक पर खूब जोरों से दिखा।हम शामिल हो जाते हैं भीड़ में और खो देते हैं अपनी पहचान!नई
पहचान दिखाने के चक्कर में।
उत्तर प्रदेश के कानपुर में गंगा बैराज में कुछ विद्यार्थी मस्ती के लिए गए थे। सेल्फी का चस्का उनकी जिंदगी पर ऐसा भारी पड़ा कि इस चक्कर में सात लोगों की डूबकर मौत हो गई। दुनिया भर में इससे जुड़ी होनेवाली मौतों में आधे से अधिक भारत में होती हैं। 2015 में दुनिया में सेल्फी लेने में 27 मौत हुई जिसमें आधी भारत में। भारत में सेल्फी के शौक में एक जापानी पर्यटक की मौत भी हो चुकी है। 2016 के शुरूआत में तीन मौत हो चुकी है। मुम्बई के युवाओं में इसके प्रति बढ़ते शौक और मौत को देखते हुए सरकार ने 15 नो सेल्फी जोन बनाया है, जहाँ सेल्फी लेना प्रतिबंधित हैं। बांद्रा इलाके में अरब सागर के तट पर सेल्फी लेते समय तीन युवतियों की डूबने से मौत हो गई। कुछ अन्य स्थानों जैसे मरीन ड्राइव और गिरगांव चौपाटी को भी ’नो सेल्फी जोन’ घोषित किया गया है।नासिक कुंभ में भी इस पर रोक थी क्योंकि इस तरह भगदड़ मच सकती थी। रूस की सरकार भी इस पर हिदायत जारी कर चुकी है।
सेल्फी एल्बो नामक बीमारी दिन भर सेल्फी लेने वाले लोगों को होती है चेहरे पर आ सकते हैं असमय रिंकल्स की समस्या आने लगती है।कैमरे से नीले रंग के हानिकारक रेडिएशन निकलते हैं जो त्वचा में मौजूद डी एन ए पर प्रभाव डालते हैं,जिससे आपके चेहरे की रंगत धीरे-धीरे उड़ सकती है और समय से पहले ही आप त्वचा के रोगों से ग्रसित हो सकते हैं।
साफ स्पष्ट है कि दिमागी बीमारी बन मत बनने दें सेल्फी के रुझान को!!मानव का एक हद से अधिक सेल्फी का क्रेज परिवार,समाज,देश और राष्ट्र के लिये उचित नहीं होता।
सेल्फी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि आज लोग अपने रिश्तेदारों को भी मिलने लगे हैं उनके साथ सेल्फी लेने के ही बहाने से!बुजुर्गों को उनकी औलाद पूछने लगी है ,सेल्फी लेते हैं साथ-साथ।किसी बहाने से तो, कुछ पल के लिये झूठा ही सही ,प्रेम तो देते हैं।
जब तक हम कोई भी कार्य महज आत्मतुष्टि के लिये करते हैं चाहे वह सेल्फी ही क्यों न हो ,वह एक सीमा में सही लगती है ,पर जब वह सेल्फी आपका अहंकार ,आत्मभिमान ,प्रदर्शन की चादर लपेट ले तो ,क्षति तो होगी ही ।क्षति की भरपाई कौन करेगा,निश्चित है वही व्यक्ति एवं उससे संबंधित सभी रिश्ते एवं पर्यावरण जहाँ वह जुड़ा होता है ।

अन्त में यही कहूँगी—

सेल्फी से मुखड़े सजे,अलग-अलग इन्सान।

सुन्दर मन से ही बने,मानव की पहचान।।

Dr.Purnima Rai,Asr
डॉ.पूर्णिमा राय,(7087775713)
शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(पंजाब)
drpurnima01.dpr@gmail.com 
 Note…This article has  been published in
कानूनी शिकंजा मैगजीन अंक No 2017
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4 COMMENTS

  1. सेल्फी पर खूब लिखा पूर्णिमा जी। बहुत बढ़िया।

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