माणो by Dr Purnima Rai

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ओ रीटा,सुन !हाँ माणो ! बोल, क्या बात  है?
हम दोनों रोज थैला उठा कर बेफ्रिक सी सड़कों की खाक छानती-फिरती हैं तो कभी कूड़ा ढेर उथल-पुथल करती हैं ।कभी प्लास्टिक, कभी बोतल ,कभी काग़ज ,कभी-कभी लोहे का सामान हाथ लग जाता है।हाँ भई हाँ!!तो???
तू जानती है एक बार एक कापी मिली मुझे! उछल कर !सच ,माँ कसम !मुझे लगा ,आज तो एक जहान मिल गया । अरे माणो  ,ऐसा  क्या था उसमें??
माणो सपनों में खोई कहने लगी,”उस कापी पर स्कूल की वर्दी पहने ,बैग लटकाये हुये , दो बच्चों के चित्र  के साथ  हम दोनों की तरह कचरे से भरा थैला उठाये दो खूबसरत लड़कियों का चित्र बना हुआ था।माणो की बात सुनकर रीटा कहने लगी ,यह कौन सी बड़ी बात है । है ,ना,आगे सुन!! उन दोनों चित्रों के नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—-कोई भी कार्य छोटा यां बड़ा नहीं है, कामयाबी महज़ कोरी स्कूली शिक्षा से नहीं मिलती,बल्कि हमारे सामाजिक आचार- व्यवहार  ,मेहनत,लगन और उद्यम से मिलती है।रीटा,तब से मुझे अहसास हुआ कि हमारे पास मेहनत,लगन,उद्यम सब कुछ है। मात्र स्कूल की शिक्षा नहीं है ,क्योंकि हम निर्धन है । मैनें यह जान लिया कि निर्धनता अभिशाप नहीं है । बड़ी-बड़ी डिग्रियों से नहीं ,वरन् अपने हौंसलों से ,अक्षर ज्ञान से भी जिंदगी बदली  जा सकती है ।तब से रोज़ सुबह मैं तेरे संग कचरा उठाने आती हूँ और दोपहर की शिफ्ट के सरकारी स्कूल में जाकर अक्षर ज्ञान प्राप्त करती हूँ।
  • विशेष…
यह लघुकथा पब्लिक इमोशन, बिजनौर समाचार पत्र के साहित्यालोक पृष्ठ पर अप्रैल 2017 में प्रकाशित हुई है।
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1 COMMENT

  1. संजू जी की लघुकथा मर्मस्पर्शी थी । अच्छी लगी । पूर्णिमा जी की संदेशपरक लघुकथा सुंदर है ।दोनों को बधाई ।

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