बचपन ना गुजरा होता!

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बचपन ना गुजरा होता!!

एक अतुकान्त कविता
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बचपन में
मै
यूँ हीँ अपनी मस्ती में 
या
अज्ञान वश शैतानी करके
गल्ती करता रहता
और
वो हमेशा की तरह
मेरी हर खता
को
यूँ हीँ
माफ करते रहते
मुझे देखते और
मुस्कराते खुश होते
मेरी उल्टी सीधी
हरकतों पर।।
लाकर देते मुझे ढेर सारे
खिलौने जो खुशियाँ देते उनको भी।।
कभी-कभी झूठ मूठ में
वह मुझे डांट भी देते,
पर उसमें भी होता एक प्यार भरा
दुलार और मुझे
चिढ़ाने  का उनका
आनंदित अंदाज
तब
मैं झट से उनसे
लिपट जाता
और खो जाता
उनके
“वात्सल्य”
में  और वो खो जाते
मेरे “बचपन” में ।।
वक्त
गुजरा
मै हो गया
“जवान” और वो “वृद्ध”,
पर
आज भी वो मेरी गल्तियों
पर मुस्कराते हैं
लेकिन
अब मैं शर्मा जाता हूँ
मगर महसूस कर लेता हूँ
उनकी इस “तमन्ना” को
कि
मैं आज भी उनसे
लिपट कर उन्हेें 
फिर वही “खुशियाँ”
दूं।
पर अब मैं वह खुशियाँ
नही दे पाता हूँ
शायद
संकोच वश या
“बड़े होने” की
गल्तफहमी में।।
तब सोचता हूँ,
अगर मैं बड़ा ना होता
तो ना
पापा की गोद छूटती
ना ही दूर होता
“वात्सल्यता”भरे  नेसर्गिक प्रेम
और
दुलार से।।
काश
“बचपन ना गुजरा होता!

प्रमोद सनाढ़्य
राजसमंद

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