धूप की प्रतीक्षा!!

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धूप की प्रतीक्षा!!
(सुशील शर्मा)

सुबह मुंह अंधेरे
एक रश्मि किरण
कान में फुसफुसाई
देखो धूप लाई हूँ।
फिर धूप उसकी गोदी से निकली।
आँगन में उचटती हुई।
पास के पेड़ पर चढ़ गई।
मैंने कहा नीचे उतरो गिर जाओगी।
बोली चलो मुझे छुओ।
मैं उसके पीछे दौड़ता गया।
कभी खिड़की पर चढ़कर
अंदर झांकती
कभी पेड़ो के ऊपरी फुनगों
को अपनी लंबाई से नापती।
मेरी पलके उठती फिर
उन्हें चूमती चारो ओर घूमती
नन्हे से बच्चे की तरह
खिलखिलाती
आँगन में लोटती फैल जाती।
चिड़ियों के संग गाती
नर्म ओस के ओंठों को छूती
मन मे छिपे पिटारों से
मेरे सुख-दुख निकाल कर
झाड़ पोंछ कर उन्हें
फिर मन मे बंद कर
मेरे कानों में प्यार से
कुछ कह जाती
वह गुलगुली धूप।
मुझे बहुत याद आती                                       वह मनचली धूप।

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