भाग्य का लेखा !by Dr.Purnima Rai

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भाग्य का लेखा !

सुनो सजन!

तनिक पास बैठो,

मन की गाँठें खोलो!

जानती हूँ, भीतर से तुम,

कितने टूट गये हो? तबसे–

जबसे माँ-बापू दूर हुए हैं!!!

कितना सुकून था तुम्हें

न घर की चिंता न बच्चों की

और न ही मुझ शर्मीली की,

कब सब्जी बनी, कब आटा आया

कब नन्हें ने दूध माँगा

औररररर… कब माँ की दवाई आई!!!

पूरे परिवार का लेखा ,हाँ लेखा-जोखा,

मैं भी कितनी भोली हूँ …

किसे कह रही हूँ 

उसे जो माँ बापू के संग 

श्रवण बनकर गया था ……..और

आज तक लौटा ही नहीं……

.हाँ हाँ हाँ …लौटा ही नहीं!!!!

भाग्य का लेखा कौन करे अब ???

ए खुदा !! बता दे जरा….

बुजुर्ग  !!!!!जो पुत्र विरह के ताप में जल रहे हैं????

पत्नी !!!!!!जो  बूढ़ी हड्डियों के दुखों को देखते-देखते रूग्ण हो गई????

बच्चे !!!!जो आधुनिकता की चकाचौंध में अपनों को भूल गये?????

..डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर। 1/4/16 को लिखी रचना

drpurima01.dpr@gmail.com

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