बेचारा सा बाल-संसार! (बालदिवस 14 नवंबर)

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बेचारा सा बाल-संसार!

सुनो जवाहर जिनको तुमने
जन्मदिवस सौंपा था।
उन कोमल हाथों ने देखो
वक्त का बोझ उठाया।।

जिनको सुर्ख गुलाब समझकर
तुमने कोट पे टांगा।
उनको तेरे देश वालों ने
मिट्टी संग मिलाया।।

देख जवाहर बाल दिवस पर
बच्चों की मजबूरी
जीवन की नित भीख मांगते
करते बाल-मजूरी
ऊंच-नीच और जाति धर्म का
माथे तिलक लगाया।
सुनो जवाहर तेरे देश ने
कैसा नाम कमाया..।।

तन से नँगे पीली आंखे
कूड़ कबाड़ टटोलें
कंधे पर लटका कर बोरा
कैसे पुस्तक खोलें ??
इनके हाथ में यह जमाना
पुस्तक थमा न पाया।
देख जवाहर सपना तेरा
कैसा रंग है लाया।।

छोटी सी वो मुन्नी
मां के संग रोज जाती है
छोटे मैलेे हाथ है लेकिन
पोछा साफ लगाती है
बुझी-बुझी सी आंखें उसकी
फीकी सी मुस्कान
देख जवाहर वो न जाने
क्या होते अरमान
गाली मिली या भूखी नज़रें
मुन्नी का सरमाया..
निर्धनता में पली बेटियां
आह ! इन्होंने क्या पाया।

ये कैसे हैं बाल-दिवस
जो महज़ समागम करवाते
रटे-रटाए जहां म तोते
झूठे नगमे गाते
हर दिन बाल-दिवस गर हो तो
देश प्राण पा जाए
उस दिन देश का इक इक बच्चा
गुरुकुल आंगन जाए
उठो ! हिंद को चाहने वालो
करो जारी फरमान
देश का हर एक बच्चा बच्चा
पाएगा सम्मान।

राजकुमार राज, शिक्षक 

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