जो अपनी पे आकर मैं नज़रें मिला दूँ!

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जो अपनी पे आकर मैं नज़रें मिला दूँ!

जो अपनी पे आकर मैं नज़रें मिला दूँ।
क़ज़ा को भी औक़ात उसकी बता दूँ।।

ज़मीं पर उतर आओगे एक पल में।
अगर ज़ख़्म दिल के तुम्हें मैं दिखा दूँ।।

खुलेगी हक़ीक़त भी जन्नत की सब पर।
फ़रिश्तों का क़िस्सा अगर मैं सुना दूँ।।

उतर जाएगा सबके चेहरों का पानी।
अगर अपनी उँगली ज़रा मैं उठा दूँ।।

है क़ातिल की तस्वीर दिल में जो मेरे।
ज़माने को आख़िर मैं क्यों कर दिखा दूँ।।

नहीं यास्मीं को भरोसा किसी पर।
मैं पहले से सब पर ये बातें जता दूँ।।


डॉ.यासमीन ख़ान 11-11-2017

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