अनमने पल(डॉ.यासमीन ख़ान)

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अनमने पल’

कुछ अनमने पल
रहे जिया निज
जल-जल
घनी उथल-पुथल
हिया ,जिगर
उदासी क्यों
ज़ेहन समझें न पर
बह चले अभाव
कल -कल
द्वन्द्व फलित प्रतिफल,
रे! व्यक्तित्व
सम्भल-सम्भल,
तज सद्य नकारात्मकता का
भयंकर गरल,
जीत दिलायें,
मेहनत,अमल
सच है ,जीना नहीं होता
सरल
अप्राप्य क्यों ख़ुद पर ढोयें
प्रतिपल
खिले अब जीवन
सहस्त्र दल शीश
कमल।


डॉ.यासमीन ख़ान मेरठ

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