ईद ,दिवाली हों या होली

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ईद ,दिवाली हों या होली।

प्रेम सिखाते हैं हमजोली।।

काहे वैर भरा नस-नस में ,

भाल लगाओ चंदन रोली।।

बेंध रहा जो अंतर्मन को,

छोड़ें हम नफरत की बोली।।

धर्म-कर्म हित आगे आयें,

मत बने बन्दूक की गोली।।

गाल गुलाबी नैन शराबी ,

भीग गये हैं दामन चोली।।

महक फिजाओं में बिखरी है,

घर-द्वार पर सजी रंगोली।।

कृष्ण मुरारी दीन-हीन के ,

सुख-समृद्धि से भर दो झोली।।

करे “पूर्णिमा ” सदैव वंदन,

सुखी नज़र आये हर टोली।।

– डॉ०पूर्णिमा राय
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