दीपावली क्षणिका विशेषांक’समीक्षा :प्रिन्स मंडावरा  

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‘दीपावली क्षणिका विशेषांक’समीक्षा :प्रिन्स मंडावरा  

विशिष्ट एवं ऐतिहासिक कार्य है “दीपावली क्षणिका विशेषांक
सर्वप्रथम अचिन्त साहित्य (वेबसाईट) के ‘दीपावली क्षणिका विशेषांक’ के लिए संपादक डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ जी व प्रकाशक डॉ. पूर्णिमा राय जी व इकसठ क्षणिकाकारों को हार्दिक बधाई देता हूँ ।इस महा यज्ञ में आहुति देने के लिए, जिस तरह समुद्र के भीतर से सीपियाँ चुनकर उनमें से मोतियों की माला बनाकर पाठकों तक पहुँचाई है; ऐसे कार्य के लिए डॉ. वीर जी बधाई के पात्र हैं। उनके अथक परिश्रम व लगन क्षणिकाओं को असीम ऊँचाईयाँ प्रदान कर रहे हैं। ये गौरवशाली पल हैं।

17 राज्यों के क्षणिकाकारों को हमें एक ही पृष्ठ पर पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, 270 क्षणिकाएँ एक से बढ़कर एक उनमें से कुछ सीधे दिल को छूती हैं, साहस को प्रदर्शित करती डाॅ. मिथिलेश दीक्षित जी की क्षणिका हमें हर परिस्थिति में जूझने की शक्ति देती है-
“जला दो दीया एक
नन्हाँ भले ही,
अँधेरों से लड़ने की
हिम्मत तो आये!”

चक्रधर शुक्ल जी की क्षणिका-
“बाज़ारों में
चहल-पहल
सजी-धजी दुकानों को देखकर
दुखिया का मन
नहीं रहा बहल!”,
ऐसी दशा को दर्शाता है कि निर्धन के लिए कैसा भी बाजार क्यों न लगा हो, सब बेकार है क्योंकि उसकी मज़दूरी से दो जून की रोटी आ सकती है; खुशियाँ नहीं। डॉ. उमेश महादोषी जी की क्षणिका समुद्र सी गहराई रखते हुए आज के दौर के अकेलेपन, सूनेपन, वैचारिक टकराव, रिश्तों में दूरियाँ आदि विसंगतियों को प्रतिबिम्बित करती हैं-
“उखट गईं
सब रिश्तों की जड़ें
विचारों के प्लावन में,
इस दीवाली
गले मिलूँगा
बस अपनी परछाईं से!”
यहाँ केवल अपना साया ही साथ है शायद अँधेरे में वो भी नहीं। तो प्रकाश प्रलय जी इस क्षणिका-
“स्वच्छता अभियान को
रॉकेट के समान
गति दीजिए,
साफ़-सुथरा
उजाला
चारों तरफ़ कीजिए!”,
के माध्यम से प्रकाश-पर्व में समाज को सार्थक दिशा प्रदान करते हैं। शिव डोयले जी की क्षणिका-
“आँधी को
चुनौती दे डाली
एक नन्हें-से
दीप ने,
थरथर काँपता रहा
अँधेरा!”
एक छोटी सी लौ यदि जल जाये सकारात्मकता की, तो आँधी-अँधेरे या कुछ भी नकारात्मकता क्या बिगाड़ सकती है? बस जलनी चाहिए लौ बिना किसी द्वेष के।

स्वयं डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर जी अपनी क्षणिका के माध्यम से व्यापक संदेश देते हैं। सच्चाई को हथियार बनाकर आगे चलें और स्वयं के भीतर हुनर हो तो क्या कोई काम ऐसा है जो असम्भव हो-
“सफलता के शिखर पर
दीप जलता है,
जब आदमी
सच की राह पर
चलता है!”

डॉ. भावना तिवारी जी की मंशा धरा से जुडी उनकी सोच व छोटे-बड़े में भेदभाव किये बिना एक प्रेरणा बनकर समाज को आगे बढ़ने व त्यौहारो को सार्थक करने की राह दिखाती है-
“झोपड़ों में
बाँटकर मिठाई
उन्होंने दिवाली मनायी,
लक्ष्मी घर आयी!”

डाॅ. वेदप्रकाश अंकुर जी की क्षणिका प्रचलित कुरीतियों पर तीखा प्रहार करती है-
“दिवाली में पता नहीं
क्या-क्या पंगे हो गए,
उन्होंने ताश के पत्ते खेले
और ज़ेब से नंगे हो गए!”

वहीं डॉ. रमा द्विवेदी जी एक ऐसी सच्चाई को उजागर करती हैं, जो शायद विकसित होते भारत के लिए आज भी कलंक समान है। निर्धन आज भी भूखे, बिन छत, नंगे तन, राहों पर है झोपडी में भी रूह काँप जाती है हालात देखकर ताउम्र कितनी मेहनत करके जीवन यापन करते है फिर भी उजाला नहीं पाते खुद को जला चूल्हा नही जलाते तो दीप तो दूर की बात है-
“ग़रीब का तन
क्षण प्रति क्षण जले,
फिर भी उसके घर
उजियार न पले!”

कम शब्दों में डॉ. आनन्द प्रकाश शाक्य जी यह क्षणिका बड़ी बात कहती है-
“वर्षों बाद
पुत्र मिला,
नेह का दीप
जला!”
तो वहीं केशव शरण जी का यह प्रयोग सहज ही ध्यान आकर्षित करता है और सार्थक दिशा भी देता है-
“यह फुलझड़ी ठीक है
वह अनार भी
यह लतर भी
इस त्यौहार पर,
एटमबम
और राकेट की
ज़रूरत क्या?”

पुष्पा सिंघी जी की क्षणिका-
“माटी का पुतला
अथक श्रम से
माटी के दीये गढ़ता,
झोपड़ी में बैठा
बाल-गोपाल
बारहखड़ी पढ़ता!”
कितनी सच है, एक तरफ़ शिक्षा का महत्व नवकोपलों के लिए सब कुछ सह सकते है ताकि उनको ये दिन न देखने पड़े और वो शिक्षा पाकर अपना भाग्य बदल सकें, तो दूसरी ओर आधुनिक परिवेश की हकीकत बिन श्रम मानव स्वस्थ रहेगा नहीं तो वो कैसे त्यौहारो का आनन्द ले सकता है कितने सुन्दर भाव, बल्कि पूर्ण भाव कहूँगा मैं तो आज के दौर के लिए।

“देहरी पे रखा दीप
जल उठा स्वयं ही,
जब विदेश गया पुत्र
लौट आया
माँ से मिलने!”,
क्षणिका में डॉ. पूर्णिमा राय जी ने विदेश से लौटे पुत्र को देखकर माँ के हृदय में उमड़ते उच्च आवेगों को उजागर किया है। डॉ. बीना रानी गुप्ता जी ने अपनी क्षणिका-
“उजास-पर्व
पत्नी निहारे पंथ,
पिया ने लिया
देश रक्षा का संकल्प!”
के माध्यम से उस परिवार की ओर कलम चलायी है, जिस परिवार का लाल देश रक्षा के लिए घर से दूर सीमा पर तैनात है। उसने अपने सभी पर्व-खुशियाँ देश को समर्पित कर दी है। ऐसे वीरों को बार बार सलाम!

ऋता शेखर ‘मधु’ जी ने शहीद परिवार की संवेदनाओं को दर्शाते हुए लिखा है-
“एक दीया
करे रौशन हजार दीये
शहीद की दहलीज़
अंधकार में डूबी,
कौन-सा दिया-
कर सकेगा रौशन?”
जिस परिवार ने अपना लाल देश पर कुर्बान कर दिया, शायद उस परिवार के आँगन कोई भी दिया उजाला न फैला सकेगा, क्योंकि उसका दीपक अमर ज्योति में नूर फैला रहा है। अपनी क्षणिका के माध्यम से सार्थक संवाद करते संदीप सरस जी ने परम्परा से व्यापक बोध ग्रहण किया है-
“राम का राज्याभिषेक
समस्त आनन्दित
कैकई
अपराधबोध से व्यथित,
इसे कहते हैं
चराग़ तले अँधेरा!”

गौरव बाजपेयी ‘स्वप्निल’ जी के कम शब्दों में कितने गहरे भाव हैं-
“अँधेरे
छलते रहेंगे,
पर दीप
जलते रहेंगे!”
नकारात्मक हावी होती रहेगी, पर सकारात्मकता रूपी दीप जलेगा ओर तिमिर छटेगा जीवन में आगे बढने का मंत्र रूप खजाना दे दिया क्षणिकाकार ने।
चंचला इंचुलकर सोनी जी ने कितने कोमल ह्रदय से भारत में फैली विषैली बेल जो कि जाति-धर्म में बाटती है, हमारे भारत को अँधकार में डुबाती है उस अँधकार को दूर करने के लिए एक माटी का दीप किस तरह कारगर है, दर्शाता है-
“प्रेरणा का
सबल स्पंदन,
जाति-धर्म से परे
माटी का दीप
दे ख़ुशी अनगिन!”

संतोष बैद जी ने श्रृंगार रस की अनुपम अनुभूति कराती क्षणिका रची है-
“तेरे लौंग का
लश्कारा
तेरी बिंदिया की
लाली,
अपनी तो हर रात
दीवाली!”
उन्होंने कितने मधुर संबंधो को दर्शाया है। एक ऐसा बिम्ब यदि सभी परिवारो में ये भाव उत्पन्न हो जाये तो कितने सुखी परिवार हो जाये धरा पर, मानो स्वर्ग का वास सा हो जाए। संगीता पाठक जी की संवेदनाओ को सलाम जब पूरे देश में दीप जल रहे हो बधाइयों के ताँते लगे हों, ऐसे में शहीद का परिवार केवल वीर के तमगो के सहारे जीवन यापन करता है। उसी को देख अपने पर्व सजाता है-
“शहीद के घर
दीवाली,
तमगों के साथ
यादों की थाली!”

डॉ. सोनिया गुप्ता जी की क्षणिका प्रभावी है, जब वे कहती हैं-
“रात भर
उसकी देह
पड़ी रही जमीन पर
अंतिम विदाई के लिए,
और एक दीया
नज़दीक जलता रहा!”
जिस शरीर से ज्योति रूपेण आत्मा परमात्मा में विलीन हो गयी, वही एक दीपक अपनी ज्योति से आस जगाता है मानो वो देह फिर ज्योतिवान हो जाए। केकी कृष्णा जी ने दीये बनाने वाले की विद्रूप दशा का मार्मिक चित्र खींचा है-
“उन्होंने
हजारों दिए बनाये,
खुद
एक भी नहीं
जला पाये!”
वे कितने दयनीय हालात में होंगे कि हजारो दीये बनाने के बाद भी इस आधुनिक युग में दिखावटी समाज ने उन दीयों का मोल ही न जाना, जिस कारण निर्धन का आँगन सूना ही रह गया। संकलन में ऐसी अनेक क्षणिकाएँ हैं, जो इसे विशिष्ट बनाती हैं।

इस ज्ञान की माला में सभी रंग के मोती पिरोहे संपादक डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ जी ने इस माला को जपने का सौभाग्य हम पाठकों को दिया। इस विशिष्ट एवं ऐतिहासिक कार्य के लिए मैं उन्हें बारम्बार बधाई देता हूँ और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
सबका साथ सबका विकास
जय हिन्द जय जवान।

प्रिन्स मंडावरा
मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)- 251001
08909408883

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